शुक्रवार, 5 मार्च 2021

राष्ट्रीय स्तर की साहित्यकार कवित्री सुभद्रा चौहान के नाम से खंडवा की पहचान क्यों नहीं- शिवसेना



खंडवा- अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अंतर्गत के प्रशासनिक एवं निजी कार्यक्रमों की शहर भर में आयोजन किए जाते हैं महिलाओं को इस अवसर पर उनके द्वारा उत्कृष्ट कार्यों पर सम्मान भी किया जाता है उक्त टिप्पणी करते हुए शिवसेना प्रमुख गणेश भावसार ने बताया कि खूब लड़ी मर्दानी महारानी लक्ष्मी बाई जैसी रचनाओं की रचनाकार  स्वतंत्रता संग्राम सेनानी  राष्ट्रीय स्तर की साहित्यकार कवित्री सुभद्रा चौहान जिनकी शादी खंडवा के एक संपन्न परिवार में हुई थी घर की जिम्मेदारी संभालने के  साथ ही वहां देश की आजादी के लिए अनेक रचनाएं लिखती रही यह वह दौर था जब अंग्रेजों का आतंक था और देश आजाद कराने के लिए अनेक आंदोलन देशभर में चल रहे थे इस दरमियान उन्होंने अनेक रचनाएं लिखी जो आज भी स्कूली पाठ्यक्रम में पढ़ाई जाती है श्री भावसार ने आगे कहा कि सुभद्रा चौहान जैसी अमर कविता कार के नाम पर भी कार्यक्रम आयोजित किया जाना चाहिए साथ ऐसी महान कविता कार को सम्मान देने के लिए खंडवा मेडिकल का कालेज भी उनके नाम पर किया जाना चाहिए उक्त मांग शिवसेना करती है।

बुधवार, 3 मार्च 2021

खण्डवा की जल प्रदाय योजना की जलापूर्ति क्षमता को बढ़ाया जाए : मुख्यमंत्री श्री चौहान, मुख्यमंत्री श्री चौहान द्वारा खण्डवा जल प्रदाय योजना की समीक्षा



भोपाल : मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने निर्देश दिए है कि खण्डवा नगर की जल प्रदाय योजना की जलापूर्ति क्षमता को बढ़ाया जाए। योजना की कमियों को तत्काल दूर किया जाए। इस वर्ष ग्रीष्म ऋतु में खण्डवा नगर के नागरिकों को सुगमता से पेयजल मिले।

मुख्यमंत्री श्री चौहान निवास कार्यालय में खण्डवा जल प्रदाय योजना की समीक्षा कर रहे थे। बैठक में मुख्य सचिव श्री इकबाल सिंह बैंस, प्रमुख सचिव नगरीय प्रशासन एवं विकास श्री नीतेश व्यास, मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव श्री मनीष रस्तोगी, मुख्यमंत्री के सचिव श्री एम. सेलवेन्द्रन तथा विभागीय अधिकारी मौजूद थे।

मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा कि प्रदेश की सभी निर्माणाधीन जल प्रदाय योजनाओं को निर्धारित समय-सीमा में पूरा किया जाए। निर्माण कार्य की गुणवत्ता बेहतर रहना चाहिये। मुख्यमंत्री श्री चौहान ने पेयजल आपूर्ति से संबंधित निर्माण और मरम्मत के कार्यों को युद्ध स्तर पर पूरा करने और सीवेज प्रोजेक्ट के कार्य भी प्राथमिकता से पूरा करने के निर्देश दिये।

बैठक में बताया गया कि खण्डवा नगर में वर्ष 2021 में 37.35 एम.एल.डी. जल की मांग है, जो वर्ष 2036 में 47.65 एम.एल.डी. और 2051 में 59.55 एम.एल.डी. होगी। वर्तमान में नगर के लिये नर्मदा जल प्रदाय योजना से 25 से 28 एम.एल.डी., सुक्ता जलप्रदाय योजना से 5 एम.एल.डी., भू-जल स्त्रोतों से 2 एम.एल.डी. इस प्रकार कुल 30 से 35 एम.एल.डी. जल की उपलब्धता है। मुख्यमंत्री श्री चौहान ने जल प्रदाय को बढ़ाने के लिये स्वीकृत कार्य योजना पर शीघ्र अमल सुनिश्चित करने के निर्देश दिये है।

मंगलवार, 2 मार्च 2021

विकासपुरूष चौहान की जीवटता रंग लाई, मरणोपरांत भी क्षेत्र को दिला गए विकास की सौगात,बजट में मिला बायपास



खंडवा- प्रदेश सरकार द्वारा मंगलवार को जारी बजट खंडवा के लिए सौगात लेकर आया। यातायात के लिए लगातार शहर से उठ रही बायपास की मांग को पूरा करते हुए बायपास निर्माण के लिए प्रदेश सरकार द्वारा बजट स्वीकृत किया गया। बायपास निर्माण के लिए बजट में 23.5 किमी रोड़ के लिए 107 करोड़ रूपए का प्रावधान रखा गया है।  हालाकि मंगलवार के दिन क्षेत्र के विकास पुरूष के नाम से पहचाने जाने वाले सांसद नंदकुमारसिंह चौहान का दुख:द निधन हो गया। लेकिन जाते-जाते भी वे क्षेत्र के विकास के लिए बायपास की अनूठी सौगात दे गए। भाजपा प्रवक्ता सुनील जैन ने बताया कि स्व.नंदू भैय्या ने अपने क्षेत्र के विकास के लिए मुख्यमंत्री चौहान से  जो भी मांगा वह उन्हे क्षेत्र के विकास के लिए दिया,फिर चाहे वह 500 करोड़ का मेडिकल कॉलेज हो या पूरे निमाड़ को हरित करने के लिए अरबों रूपए की उद्वहन सिंचाई योजना हो। केंद्रीय विद्यालय के साथ ही संगीत विद्यालय और तीन पुलिया पर तीन भुजाओं का पुल निर्माण हो चाहे किशोर समाधि या किशोर स्मारक के निर्माण का मामला हो उनके कार्यकाल की विशेष उपलब्ध्यिां रही। बीमार अवस्था में भी वे अपने संसदीय क्षेत्र के लिए लगातार प्रयत्नशील रहे जिसका ही परिणाम है कि मंगलवार को जारी बजट में सांसद नंदकुमारसिंह चौहान एवं खंडवा के सक्रिय विधायक देवेन्द्र वर्मा के प्रयासों से प्रदेश के वित्तमंत्री द्वारा खंडवा में बायपास के लिए बजट पारित कर क्षेत्रवासियों की सौंगात दी गई।

सोमवार, 1 मार्च 2021

पारिवारिक विवाद के चलते 5 लोगों ने मिलकर की वृद्ध की हत्या, मृतक का हुआ अंतिम संस्कार



खण्डवा- खंडवा जिले के खालवा थाना अंतर्गत ग्राम झिरपा में पारिवारिक विवाद के चलते 5 लोगों ने मिलकर एक वृद्ध की रविवार को देर रात में हत्या कर दी। खालवा पुलिस ने आरोपी महिला लालबाई पति तुलसीराम, कलीराम, राजेश, तुलसीराम, लाला के खिलाफ भादवि की धारा 147, 148, 149, 302 के तहत मामला दर्ज कर लिया है। खालवा पुलिस ने शव परीक्षण के दौरान मृतक का अंतिम संस्कार कर दिया है। वही हरसूद एसडीओपी रविंद्र वास्कले और एफएसएल की टीम ने मौका मुआयना किया। पुलिस सूत्रों ने बताया कि मृतक रामा की बहू कुछ दिन पहले भाग गई थी इसके एवज में 35 हजार रुपये में टूटक हुई थी। टूटक की राशि नहीं देने की बात को लेकर विवाद हुआ और 5 लोगों ने मिलकर रामा की हत्या कर दी। अप्रिय घटना होने की आशंका के चलते एसडीओपी के नेतृत्व में पुलिस फोर्स के साए में मृतक रामा का अंतिम संस्कार ग्राम झिरपा में किया गया। फिलहाल आरोपियों की गिरफ्तारी शेष है।

शिक्षा विभाग मनमानी ट्यूशन फीस पर अंकुश लगाए- शिवसेना



खंडवा- जागरूक पालक शिक्षक संघ द्वारा ऑनलाइन पढ़ाई के नाम पर मनमानी ट्यूशन फीस को लेकर आवेदन निवेदन के साथ ही शासन-प्रशासन से गुहार लगाई जा रही है इसके बाद भी समस्या जस की तस बनी हुई उक्त टिप्पणी करते हुए शिवसेना प्रमुख गणेश भावसार ने कहा कि बढ़ती हुई महंगाई ने जहां एक और मध्यवर्गीय परिवार का बजट बिगाड़ रखा है वही शासन से गुहार लगाने के बाद भी मनमानी ट्यूशन फीस को लेकर कोई ठोस कदम स्थानीय प्रशासन नहीं ले पा रहा है। सवाल यह उठता है कि क्या निजी स्कूलों पर कार्रवाई करने में शासकीय अधिकारी सक्षम नहीं है? जबकि जागरूक पालक शिक्षक संघ द्वारा 2 माह से भी अधिक समय से लिखित में शिकायतें भी की जा रही है। इसके बाद भी कार्रवाई नहीं होना कहीं संकायये पैदा कर रही है।
श्री भावसार ने आगे कहा कि जिन जनप्रतिनिधियों को आम जनता ने चुना था वह भी आज आम जनता की गुहार लगाने के बावजूद भी लाचार नजर आ रहे हैं। शिवसेना जिला प्रशासन से मांग करती है कि मनमानी फीस वृद्धि को लेकर कार्रवाई करें ।अन्यथा आने वाले दिनों में शिवसेना  जागरूक पालक शिक्षक संघ के पक्ष में जनप्रतिनिधियों के साथ ही प्रशासनिक जिम्मेदार अधिकारियों को नींद से जगाने के लिए जन आंदोलन करेगी।

शनिवार, 27 फ़रवरी 2021

हरदा जिले में भी धूमधाम से मनाया गया संत शिरोमणि रविदास जी का 644वाँ जन्मोत्सव



हरदा- सोजर सोशल वेलफेयर फॉउंडेशन हरदा ने पंतलाई में संत श्रीरोमानी गुरु रविदास जी की 644 वी जयंती शाम 8 बजे मनाई गयी। जिसे श्रीमती सती लोंगरे फाउंडेशन की अध्यक्ष एवं सोनू लोंगरे महासचिव के द्वारा गुरु रविदास जी एबं बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर की प्रतिमा के सामने दिप प्रोजलित कर पुष्प अर्पित किये गये। इससे पहले पूरे परिसर को दिप जलाकर मनाया गया संस्थापक रामचरन लोंगरे, वीरेंद्र लोंगरे, प्रियंका लोंगरे किरण मसुरे सहित रामदास लश्करे रामनाथ, हरनाथ मंडराई, राजकुमार, रितेश चौहान, राहुल, चेतन, लश्करे, रामनारायण, परशराम लोंगरे सहित उपस्थित थे रविदास जी की आरती कि गई प्रसाद वितरण किया गया इस अवसर पर संथापक रामचरन लोंगरे ने कंहा की हमे संत सतगुरु के बताये गये मार्ग पर चलना चाहिए संतों को आना समाज को जाग्रत करना है। औऱ आडम्बरो से बचना है संत यहाँ कोई जातियों धर्म बनाने नहीं आते वे तो मनाव की आपसी भाई चारो एवं समानता का उपदेश देने के लिए आते है रविदास जी ने अपनी वाणी मैं कंहा ऐसा चाहू राज में, जंहा सबको मिले अन्नं ! छोटे और बड़े सब सम बसे, तब रविदास प्रशासन !! वही काम आज की सरकार भी करने की कोशिश मैं लगी हैं! सती लोंगरे ने कंहा महिलायें अपने स्वस्थ का खयाल रखते हुए परिवार को भी स्वस्थ रखना है स्वस्थ्य मनुष्य ही स्वस्थ नागरिक होता हैं अपने आस पास साफ सफाई रखे एवं रखे एवं नशीली चीजों का उपयोग नही करना चाहिए यह स्वस्थ के लिए ओर परिवार के लिए बहुत खतरनाक है परुषों को भी नशा से बचाना चाहिए ऐसा आज सभी संकल्प ले !पूर्व सरपंच लक्ष्मी नारायण मंडराई ने सामाजिक एकता बनाये रखने की बात कही और हमारे महान परुषों के विचारों को अपने जीवन में उतारने की जरूरत है! अंत में आभार माना सोनू लोंगरे ने आये सभी लोंगो को आभार न माना एवं अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दे और बेटियो को आत्म रक्षा करने का गुण शिखाएँ ओर उन्हें निडर बनाये आज बेटियां घरों में सुरक्षित नही है इसलिए सब को सावधान रहने की आवश्यकता है बेटियां की शिक्षा स्वस्थ्य ही अच्छा जीवन देती है!

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2021

विज्ञान भैरव तंत्र की ध्यान संबंधित 30वीं विधि (देखने की सात विधियां) का क्या विवेचन है?



विज्ञान भैरव तंत्र की ध्यान विधि–30;-

07 FACTS;-

1-भगवान शिव कहते है:-.
''आंखें बंद करके अपने अंतरस्‍थ अस्‍तित्‍व को विस्‍तार से देखो। इस प्रकार अपने सच्‍चे स्‍वभाव को देख लो।''

2-‘ अपनी आंखें बंद कर लो। लेकिन आंखे बंद करना ही काफी नहीं है।उसका अर्थ है कि आँखो को बंद करके उनकी गति भी रोक दो ..समग्र रूप से बंद कर लो।अन्‍यथा आंखें बाहर की ही चीजें देखती रहेगी।बंद आंखें भी प्रतिबिंबों को देखती है। असली चीजें तो नहीं रहती। लेकिन उनके चित्र, विचार, संचित यादें तब भी सामने तैरती रहेंगी।इसलिए जब तक को वे तैरती रहेगी ;तब तक आंखों को समग्ररूपेण बंद मत समझो। समग्र रूप से बंद होने का अर्थ है कि अब देखने को कुछ भी नहीं है। इस फर्क को ठीक से समझना है। हर कोई ,हर क्षण आंखें बंद करता है। रात में भी तुम आंखें बंद रखते हो। लेकिन इससे अंतरस्‍थ स्‍वभाव प्रकट नहीं हो जाएगा। आंखें ऐसे बंद करो कि देखने को कुछ भी न बचे—न बाहर का विषय बचे न भीतर का विषय बचे। तुम्‍हारे सामने बस खाली अँधेरा रह जाए, मानो तुम अचानक अंधे हो गए हो ..यथार्थ के प्रति ही नहीं, स्‍वप्‍न वाले यथार्थ के प्रति भी।

3- इसमे एक लंबे अभ्‍यास की जरूरत पड़ेगी। यह अचानक संभव नहीं है। जब भी तुम्‍हें लगे कि यह आसानी से किया जा सकता है और जब भी तुम्‍हें समय हो आंखें बंद कर लो और आंखों की सभी भीतरी हलचल को भी बंद कर दो।आंखों की किसी तरह की भी गति मत होने दो। भाव करो ,कि आंखें पत्‍थर हो गई है। और तब आंखों की पथराई अवस्‍था में ठहरे रहो। कुछ भी मत करो; मात्र स्‍थित रहो। तब किसी दिन अचानक तुम्‍हें यह बोध होगा कि तुम अपने भीतर देख रहे हो।
यह विधि भीतर से देखने के लिए बहुत सहयोगी है। और यह दर्शन तुम्‍हारी समग्र चेतना को, तुम्‍हारे समूचे अस्‍तित्‍व को रूपांतरित कर देता है। कारण यह है कि जब तुम अपने को भी भीतर से देखते हो तो तुम तुरंत संसार से भिन्‍न हो जाते हो। यह झूठा तादात्‍म्‍य/ false identification , कि मैं शरीर हूं, इसलिए है क्योंकि हम अपने शरीर को बाहर से देखते है। अगर कोई उसे भीतर से देख सके तो द्रष्‍टा शरीर से भिन्‍न हो जाता है। और तब तुम अपनी चेतना को ,अंगूठे से सिर तक अपने शरीर के भीतर गति कर सकते हो; परिभ्रमण कर सकते हो।

4- और एक बार तुम शरीर को अंदर से देखने और उसमें गति करने में समर्थ हो गए , एक बार तुम ने जान लिया कि तुम शरीर से पृथक हो, तो तुम एक महा बंधन से मुक्‍त हो गए। अब तुम पर गुरूत्‍वाकर्षण की पकड़ न रही , कोई सीमा न रही। अब तुम परिपूर्ण स्‍वतंत्र हो, अब तुम शरीर के बाहर जा सकते हो। अब बाहर-भीतर होना आसान है। अब तुम्‍हारा शरीर महज निवास स्‍थान है।आंखें बंद करो और अपने अंतरस्‍थ प्राणी को विस्‍तार से देखो। और भीतर-भीतर शरीर के अंग-अंग में परिभ्रमण करो। सबसे पहले अंगूठे के पास जाओ। पूरे शरीर को भूल जाओ। और अंगूठे पर पहु्ंचो। वहां रुको और उसका दर्शन करो। फिर पाँव से होकर ऊपर बढ़ो; और ऐसे प्रत्‍येक अंग को देखो।

5- तब बहुत सी बातें घटित होंगी और तुम्‍हारा शरीर ऐसा संवेदनशील वाहन बन जाएगा जिसका तुम कल्‍पना नहीं कर सकते। तब अगर तुम किसी को स्‍पर्श करोगे तो तुम पूरे अपने हाथ में गति कर जाओगे और वह स्‍पर्श रूपांतरकारी होगा।महान गुरु के स्‍पर्श का यही अर्थ है कि वह अपने किसी अंग में भी समग्र रूप से पहुंच सकता है और वहां एकाग्र हो सकता है।अगर तुम समग्र रूप से अपने किसी अंग में चले जाओ तो वह अंग जीवंत हो जाता है। इतना जीवंत कि तुम कल्‍पना भी नहीं कर सकते कि उसे क्‍या हो गया है। तब तुम अपनी आंखों में समग्ररूपेण समा सकते हो। इस तरह आँखो में समाकर अगर तुम किसी दूसरे की आंखों में झांकोगे तो तुम उसमें प्रवेश कर जाओगे उसकी गहनत्म गहराई को छू जाओगे।

6-एक महान गुरु अनेक काम करता है। उनमें से एक बुनियादी काम यह है कि तुम्‍हारा विश्‍लेषण करने के लिए तुममें गहरे उतरता है। और वह तुम्‍हारे अंधेरे तल घरों में प्रवेश करता है। तुम्‍हें भी अपने इन तल घरों का पता नहीं है। अगर गुरु कहेगा कि तुम्‍हारे भीतर कुछ चीजें छिपी पड़ी है, तो तुम उसका विश्‍वास भी नहीं करोगे क्योंकि तुम्‍हें उनका पता ही नहीं है। तुम अपने मन के एक ही हिस्‍से को जानते हो और वह उसका बहुत छोटा हिस्सा ,ऊपरी हिस्‍सा है या पहली पर्त भर है। उसके पीछे नौ पर्तें छिपी है जिनकी तुम्‍हें कोई खबर नहीं है। लेकिन आंखों के द्वारा उनमें प्रवेश किया जा सकता है।
आंखें बंद करके अपने अंतरस्‍थ अस्‍तित्‍व को विस्‍तार से देखना अथार्त अपने शरीर को भीतर से, अपने आंतरिक केंद्र से देखना है। केंद्र पर खड़े हो जाओ और देखो। तब तुम शरीर से पृथक हो जाओगे। क्‍योंकि द्रष्‍टा कभी दृश्‍य नहीं होता है, निरीक्षक अपने विषय से भिन्‍न होता है। अगर तुम अंदर से अपने शरीर को देख सको तो तुम कभी फिर इस भ्रम में नहीं पड़ोगे कि मैं शरीर हूं। तब तुम सर्वथा पृथक रहोगे ... शरीर में रहोगे लेकिन शरीर नहीं रहोगे।

7- यह पहला चरण है। फिर तुम और गति करने के लिए स्‍वतंत्र हो। शरीर से मुक्‍त होकर, तादात्‍म्‍य से मुक्‍त होकर तुम अपने मन की गहराइयों में प्रवेश कर सकते हो। अब तुम उन नौ पर्तों में, जो भीतर है और अचेतन है, प्रवेश कर सकते हो।यह मन की अंतरस्‍थ गुफा है। और अगर मन की गुफा में प्रवेश करते हो तो तुम मन से भी प्रथक हो जाते हो। तब तुम देखोगें कि मन भी एक विषय है जिसे देखा जा सकता है। और जो मन में प्रवेश कर रहा है वह मन से पृथक और भिन्‍न है। अंतरस्‍थ अस्‍तित्‍व को विस्‍तार से देखने का यही अर्थ है ..मन में प्रवेश करो। शरीर और मन दोनों के भीतर जाना है। और भीतर से उन्‍हें देखना है। तब तुम केवल साक्षी हो। और इस साक्षी में प्रवेश नहीं हो सकता। इसी से यह तुम्‍हारा अंतरतम है; यही तुम हो। जिसमें प्रवेश किया जा सकता है ,जिसे देखा जा सकता है। जब तुम वहां आ गए जिससे आगे नहीं जाया जा सकता, जिसमें प्रवेश नहीं किया जा सकता, वह तुम नहीं हो।तभी तुम समझना कि तुम अपने सच्‍चे 'स्‍व' के पास, अपनी आत्‍मा के पास पहुंचे हो।

क्या हम आत्‍मा के साक्षी हो सकते है?-

05 FACTS;-

1-स्‍मरण रहे कि तुम साक्षी के साक्षी नहीं हो सकते। अगर कोई कहता है कि मैंने अपने साक्षी को देखा है तो वह गलत कहता है। जिसे तुम देख सकते हो वह तुम नहीं हो। जिसका तुम निरीक्षण कर सकते हो वह तुम नहीं हो। जिसका तुम्‍हें बोध हो सकता है कि वह तुम नहीं हो।अगर तुम ने साक्षी आत्‍मा को देख लिया तो वह साक्षी आत्‍मा ही नहीं है। क्योंकि तुम अपने अखंड अस्‍तित्‍व को दो में या दृश्‍य और द्रष्‍टा में नहीं बांट सकते।लेकिन मन के पार एक बिंदु आता है। जहां तुम मात्र होते हो। अब वहां केवल द्रष्‍टा है, मात्र साक्षी भाव है। इस बात को बुद्धि से तर्क से समझना बहुत कठिन है। क्‍योंकि वहां बुद्धि की सभी कोटियां समाप्‍त हो जाती है।

2-ज्ञान का अर्थ है द्वैत अथार्त विषय और विषयी के बीच, ज्ञाता और ज्ञात/knower and known के बीच। इसलिए चार्वाक, जिसने संसार के एक अत्‍यंत तर्कपूर्ण दर्शनशास्‍त्र की स्‍थापना की;कहता है कि जो लोग कहते है कि हमने आत्‍मा को जान लिया है वे मूढ़ता की बात करते है। आत्‍म ज्ञान असंभव है क्‍योंकि आत्‍मा निर्विवाद रूप से जानने वाला है। उसे जाना जाने वाले में बदला नहीं जा सकता। और तब चार्वाक कहता है कि अगर तुम आत्‍मा को नहीं जान सकते; तो यह कैसे कह सकते हो कि आत्‍मा है।तर्क की इस कठिनाई के कारण चार्वाक ने कहा कि तुम आत्‍मा को नहीं जान सकते हो, कोई आत्‍म-ज्ञान नहीं होता। और इसलिए तुम कैसे कह सकते हो कि आत्‍मा है। जो भी तुम जानते हो वह आत्‍मा नहीं है। जो जानता है वह आत्‍मा है। जो जाना जाता है वह आत्‍मा नहीं हो सकती है। क्‍योंकि तब कौन जानेगा और किसको जानेगा? इसलिए तुम तर्क के अनुसार नहीं कह सकते ,कि मैंने अपनी आत्‍मा को जान लिया। वह बेतुका है, तर्कहीन है।

3- चार्वाक जैसे लोग, जो आत्‍मा के अस्‍तित्‍व में विश्‍वास नहीं रखते, अनात्मवादी कहलाते है। वे कहते है कि आत्‍मा नहीं है; क्योकि उसे जाना नहीं जा सकता है।अगर तर्क ही सब कुछ है तो वे सही है। लेकिन जीवन का यह रहस्‍य है कि तर्क सिर्फ आरंभ है, अंत नहीं है। एक क्षण आता है ,जब तर्क समाप्‍त हो जाता है। लेकिन तुम समाप्‍त , नहीं होते हो तुम तब भी होते हो। जीवन अतर्क्‍य है। यही कारण है कि यह समझना बहुत कठिन होता है कि सिर्फ साक्षी बचता है।आकाश को देखो ;नीला दिखाई देता है। लेकिन आकाश नीला नहीं है। वह कॉस्मिक किरणों (Galactic Cosmic Rays) से भरा है। क्‍योंकि वहां कोई विषय वस्‍तु नहीं है। इसीलिए आकाश नीला दिखाई देता है। वे किरणें प्रतिबिंबित नहीं कर सकती, तुम्‍हारी आंखों तक नहीं आ सकती। अगर तुम अंतरिक्ष में जाओ और वहां कोई वस्‍तु न हो तो तुम्‍हें वहां अँधेरा ही अँधेरा मालूम होगा जबकि तुम्‍हारे बगल से किरण गुजर रही है। प्रकाश को जानने के लिए विषय वस्‍तु का होना अनिवार्य है।

4- तो चार्वाक कहता है कि अगर तुम भीतर जाते हो और उस बिंदु पर पहुंचते हो जहां सिर्फ साक्षी बचता है। और कुछ देखने को नहीं बचता। देखने के लिए कोई विषय अवश्‍य चाहिए। तभी तुम साक्षित्‍व को जान सकते हो। तर्क के अनुसार, विज्ञान के अनुसार यह सही है। लेकिन यह अस्‍तित्‍वत: यही नहीं है। जो लोग सचमुच भीतर प्रवेश करते है वे ऐसे बिंदु पर पहुंचते है जहां मात्र चैतन्‍य के अतिरिक्‍त कोई भी विषय नहीं रहता है। तुम हो, लेकिन देखने को कुछ भी नहीं है ...एक मात्र मात्र दृष्‍टा है।
अपने आस-पास किसी विषय के बिना, शुद्ध विषयी होता है। जिस क्षण तुम इस बिंदू पर पहुंचते हो। तुम अपने अस्‍तित्‍व के परम लक्ष्‍य पर पहुंच गए। उसे तुम 'आदि 'कह सकते हो। उसे तुम 'अंत' भी कह सकते हो। वह 'आदि 'और 'अंत 'दोनों है। वह आत्‍म-ज्ञान है।

5- भाषागत रूप से आत्‍म ज्ञान शब्‍द गलत है। क्‍योंकि भाषा में इसके संबंध में कुछ भी नहीं कहा जा सकता। जब तुम अद्वैत के जगत में प्रवेश करते हो, तो भाषा व्‍यर्थ हो जाती है। भाषा तभी तक सार्थक है जब तक तुम द्वैत के जगत में हो। द्वैत के जगत में भाषा अर्थवान है; क्‍योंकि भाषा द्वैतवादी जगत की कृति है। उसका हिस्‍सा है। अद्वैत में प्रवेश करते ही भाषा व्‍यर्थ हो

जाती है।चायनीज फिलॉसफर लाओत्‍से ने कहा है कि जो कहा जा सकता है वह सच नहीं हो सकता और जो सच है वह कहा नहीं जा सकता। वह मौन रह गया। जिंदगी के अंतिम दिनों तक उसने कुछ भी लिखने से इनकार किया। उसने कहा कि अगर मैं कुछ कहूं तो वह असत्‍य हो जाएगा। क्‍योंकि उस जगत के संबंध में कुछ भी नहीं कहा जा सकता जहां एक ही बचता है।
आंखे बंद करके अपने अंतरस्‍थ अस्‍तित्‍व ...शरीर और मन दोनों को विस्‍तार से देखो।इस प्रकार अपने सच्‍चे स्‍वभाव को देख लो।

इस विधि का प्रयोग कैसे करे?-

03 FACTS;-

1- अगर तुम इस विधि का प्रयोग करते हो तो पहले आंखों को समग्र रूप से बंद होना जरूरी है और फिर आंखों की सारी गति रोक दो ; पत्‍थर की तरह हो जाने दो। इसका अभ्यास करते हुए किसी दिन अचानक, हठात तुम अपने अंदर देखने में समर्थ हो जाओगे।वे आंखें जो सतत बाहर देखने की आदी थी; भीतर को मुड़ जाएंगी।और तुम्‍हें अपने अंतरस्‍थ की एक झलक मिल जायेगी। फिर कोई कठिनाई नहीं रहेगी। एक बार तुम्‍हें अंतरस्‍थ की झलक मिल गई तो तुम जान लेते हो कि क्‍या किया जाए और कैसे गति की जाए। परन्तु झलक कठिन है. उसके बाद तुम्‍हें तरकीब हाथ लग जायेगी। तब वह एक खेल, एक युक्‍ति की बात हो जाएगी, किसी भी क्षण तुम अपनी आंखे बंद कर सकते हो।

2-उदाहरण के लिए गौतम बुद्ध के जीवन का अंतिम दिन था।उनकी इस आंतरिक यात्रा के चार चरण थे।पहले उन्‍होंने आंखें बंद की और तब उन्‍होंने आंखों को स्‍थिर कर लिया। यह दूसरी बात है। और तीसरी बात कि उन्‍होंने अपने शरीर को देखा और अंत में अपने केंद्र पर, मूलस्‍त्रोत पर पहुंच गए।यह वजह है कि उनकी मृत्‍यु नहीं कहलाती। हम उसे निर्वाण कहते है। सामान्‍यत: हम मरते है, क्‍योंकि हमारी मृत्‍यु घटित होती है। गौतम बुद्ध के साथ यह मृत्‍यु घटित नहीं हुई। मृत्‍यु के आने के पहले वे अपने स्‍त्रोत को वापस लौट गए थे। उनके मृत शरीर की ही मृत्‍यु हुई। वे वहां मौजूद नहीं थे।

3-बौद्ध परंपरा में कहा जाता है कि गौतम बुद्ध की कभी मृत्‍यु नहीं घटित हुई; मृत्‍यु उन्‍हें पकड़ ही नहीं पाई। मृत्‍यु ने उनका पीछा किया। जैसे कि वह सबका पीछा करती है। लेकिन वे उसके जाल में नहीं आए। मृत्‍यु उनके द्वारा छली गई। गौतम बुद्ध मृत्‍यु के पार खड़े होकर हंस रहे होंगे। क्‍योंकि मृत्‍यु मृत शरीर के पास खड़ी थी। यह वही विधि है इसके चार चरण करो और आगे बढ़ो। और जब एक झलक मिल जाएगी तो पूरी चीज आसान और सरल हो जाएगी। तब तुम किसी भी क्षण अंदर जा सकते हो। और बाहर आ सकते हो वैसे ही जैसे तुम अपने घर के बाहर-भीतर होते हो।