शनिवार, 27 फ़रवरी 2021

हरदा जिले में भी धूमधाम से मनाया गया संत शिरोमणि रविदास जी का 644वाँ जन्मोत्सव



हरदा- सोजर सोशल वेलफेयर फॉउंडेशन हरदा ने पंतलाई में संत श्रीरोमानी गुरु रविदास जी की 644 वी जयंती शाम 8 बजे मनाई गयी। जिसे श्रीमती सती लोंगरे फाउंडेशन की अध्यक्ष एवं सोनू लोंगरे महासचिव के द्वारा गुरु रविदास जी एबं बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर की प्रतिमा के सामने दिप प्रोजलित कर पुष्प अर्पित किये गये। इससे पहले पूरे परिसर को दिप जलाकर मनाया गया संस्थापक रामचरन लोंगरे, वीरेंद्र लोंगरे, प्रियंका लोंगरे किरण मसुरे सहित रामदास लश्करे रामनाथ, हरनाथ मंडराई, राजकुमार, रितेश चौहान, राहुल, चेतन, लश्करे, रामनारायण, परशराम लोंगरे सहित उपस्थित थे रविदास जी की आरती कि गई प्रसाद वितरण किया गया इस अवसर पर संथापक रामचरन लोंगरे ने कंहा की हमे संत सतगुरु के बताये गये मार्ग पर चलना चाहिए संतों को आना समाज को जाग्रत करना है। औऱ आडम्बरो से बचना है संत यहाँ कोई जातियों धर्म बनाने नहीं आते वे तो मनाव की आपसी भाई चारो एवं समानता का उपदेश देने के लिए आते है रविदास जी ने अपनी वाणी मैं कंहा ऐसा चाहू राज में, जंहा सबको मिले अन्नं ! छोटे और बड़े सब सम बसे, तब रविदास प्रशासन !! वही काम आज की सरकार भी करने की कोशिश मैं लगी हैं! सती लोंगरे ने कंहा महिलायें अपने स्वस्थ का खयाल रखते हुए परिवार को भी स्वस्थ रखना है स्वस्थ्य मनुष्य ही स्वस्थ नागरिक होता हैं अपने आस पास साफ सफाई रखे एवं रखे एवं नशीली चीजों का उपयोग नही करना चाहिए यह स्वस्थ के लिए ओर परिवार के लिए बहुत खतरनाक है परुषों को भी नशा से बचाना चाहिए ऐसा आज सभी संकल्प ले !पूर्व सरपंच लक्ष्मी नारायण मंडराई ने सामाजिक एकता बनाये रखने की बात कही और हमारे महान परुषों के विचारों को अपने जीवन में उतारने की जरूरत है! अंत में आभार माना सोनू लोंगरे ने आये सभी लोंगो को आभार न माना एवं अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दे और बेटियो को आत्म रक्षा करने का गुण शिखाएँ ओर उन्हें निडर बनाये आज बेटियां घरों में सुरक्षित नही है इसलिए सब को सावधान रहने की आवश्यकता है बेटियां की शिक्षा स्वस्थ्य ही अच्छा जीवन देती है!

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2021

विज्ञान भैरव तंत्र की ध्यान संबंधित 30वीं विधि (देखने की सात विधियां) का क्या विवेचन है?



विज्ञान भैरव तंत्र की ध्यान विधि–30;-

07 FACTS;-

1-भगवान शिव कहते है:-.
''आंखें बंद करके अपने अंतरस्‍थ अस्‍तित्‍व को विस्‍तार से देखो। इस प्रकार अपने सच्‍चे स्‍वभाव को देख लो।''

2-‘ अपनी आंखें बंद कर लो। लेकिन आंखे बंद करना ही काफी नहीं है।उसका अर्थ है कि आँखो को बंद करके उनकी गति भी रोक दो ..समग्र रूप से बंद कर लो।अन्‍यथा आंखें बाहर की ही चीजें देखती रहेगी।बंद आंखें भी प्रतिबिंबों को देखती है। असली चीजें तो नहीं रहती। लेकिन उनके चित्र, विचार, संचित यादें तब भी सामने तैरती रहेंगी।इसलिए जब तक को वे तैरती रहेगी ;तब तक आंखों को समग्ररूपेण बंद मत समझो। समग्र रूप से बंद होने का अर्थ है कि अब देखने को कुछ भी नहीं है। इस फर्क को ठीक से समझना है। हर कोई ,हर क्षण आंखें बंद करता है। रात में भी तुम आंखें बंद रखते हो। लेकिन इससे अंतरस्‍थ स्‍वभाव प्रकट नहीं हो जाएगा। आंखें ऐसे बंद करो कि देखने को कुछ भी न बचे—न बाहर का विषय बचे न भीतर का विषय बचे। तुम्‍हारे सामने बस खाली अँधेरा रह जाए, मानो तुम अचानक अंधे हो गए हो ..यथार्थ के प्रति ही नहीं, स्‍वप्‍न वाले यथार्थ के प्रति भी।

3- इसमे एक लंबे अभ्‍यास की जरूरत पड़ेगी। यह अचानक संभव नहीं है। जब भी तुम्‍हें लगे कि यह आसानी से किया जा सकता है और जब भी तुम्‍हें समय हो आंखें बंद कर लो और आंखों की सभी भीतरी हलचल को भी बंद कर दो।आंखों की किसी तरह की भी गति मत होने दो। भाव करो ,कि आंखें पत्‍थर हो गई है। और तब आंखों की पथराई अवस्‍था में ठहरे रहो। कुछ भी मत करो; मात्र स्‍थित रहो। तब किसी दिन अचानक तुम्‍हें यह बोध होगा कि तुम अपने भीतर देख रहे हो।
यह विधि भीतर से देखने के लिए बहुत सहयोगी है। और यह दर्शन तुम्‍हारी समग्र चेतना को, तुम्‍हारे समूचे अस्‍तित्‍व को रूपांतरित कर देता है। कारण यह है कि जब तुम अपने को भी भीतर से देखते हो तो तुम तुरंत संसार से भिन्‍न हो जाते हो। यह झूठा तादात्‍म्‍य/ false identification , कि मैं शरीर हूं, इसलिए है क्योंकि हम अपने शरीर को बाहर से देखते है। अगर कोई उसे भीतर से देख सके तो द्रष्‍टा शरीर से भिन्‍न हो जाता है। और तब तुम अपनी चेतना को ,अंगूठे से सिर तक अपने शरीर के भीतर गति कर सकते हो; परिभ्रमण कर सकते हो।

4- और एक बार तुम शरीर को अंदर से देखने और उसमें गति करने में समर्थ हो गए , एक बार तुम ने जान लिया कि तुम शरीर से पृथक हो, तो तुम एक महा बंधन से मुक्‍त हो गए। अब तुम पर गुरूत्‍वाकर्षण की पकड़ न रही , कोई सीमा न रही। अब तुम परिपूर्ण स्‍वतंत्र हो, अब तुम शरीर के बाहर जा सकते हो। अब बाहर-भीतर होना आसान है। अब तुम्‍हारा शरीर महज निवास स्‍थान है।आंखें बंद करो और अपने अंतरस्‍थ प्राणी को विस्‍तार से देखो। और भीतर-भीतर शरीर के अंग-अंग में परिभ्रमण करो। सबसे पहले अंगूठे के पास जाओ। पूरे शरीर को भूल जाओ। और अंगूठे पर पहु्ंचो। वहां रुको और उसका दर्शन करो। फिर पाँव से होकर ऊपर बढ़ो; और ऐसे प्रत्‍येक अंग को देखो।

5- तब बहुत सी बातें घटित होंगी और तुम्‍हारा शरीर ऐसा संवेदनशील वाहन बन जाएगा जिसका तुम कल्‍पना नहीं कर सकते। तब अगर तुम किसी को स्‍पर्श करोगे तो तुम पूरे अपने हाथ में गति कर जाओगे और वह स्‍पर्श रूपांतरकारी होगा।महान गुरु के स्‍पर्श का यही अर्थ है कि वह अपने किसी अंग में भी समग्र रूप से पहुंच सकता है और वहां एकाग्र हो सकता है।अगर तुम समग्र रूप से अपने किसी अंग में चले जाओ तो वह अंग जीवंत हो जाता है। इतना जीवंत कि तुम कल्‍पना भी नहीं कर सकते कि उसे क्‍या हो गया है। तब तुम अपनी आंखों में समग्ररूपेण समा सकते हो। इस तरह आँखो में समाकर अगर तुम किसी दूसरे की आंखों में झांकोगे तो तुम उसमें प्रवेश कर जाओगे उसकी गहनत्म गहराई को छू जाओगे।

6-एक महान गुरु अनेक काम करता है। उनमें से एक बुनियादी काम यह है कि तुम्‍हारा विश्‍लेषण करने के लिए तुममें गहरे उतरता है। और वह तुम्‍हारे अंधेरे तल घरों में प्रवेश करता है। तुम्‍हें भी अपने इन तल घरों का पता नहीं है। अगर गुरु कहेगा कि तुम्‍हारे भीतर कुछ चीजें छिपी पड़ी है, तो तुम उसका विश्‍वास भी नहीं करोगे क्योंकि तुम्‍हें उनका पता ही नहीं है। तुम अपने मन के एक ही हिस्‍से को जानते हो और वह उसका बहुत छोटा हिस्सा ,ऊपरी हिस्‍सा है या पहली पर्त भर है। उसके पीछे नौ पर्तें छिपी है जिनकी तुम्‍हें कोई खबर नहीं है। लेकिन आंखों के द्वारा उनमें प्रवेश किया जा सकता है।
आंखें बंद करके अपने अंतरस्‍थ अस्‍तित्‍व को विस्‍तार से देखना अथार्त अपने शरीर को भीतर से, अपने आंतरिक केंद्र से देखना है। केंद्र पर खड़े हो जाओ और देखो। तब तुम शरीर से पृथक हो जाओगे। क्‍योंकि द्रष्‍टा कभी दृश्‍य नहीं होता है, निरीक्षक अपने विषय से भिन्‍न होता है। अगर तुम अंदर से अपने शरीर को देख सको तो तुम कभी फिर इस भ्रम में नहीं पड़ोगे कि मैं शरीर हूं। तब तुम सर्वथा पृथक रहोगे ... शरीर में रहोगे लेकिन शरीर नहीं रहोगे।

7- यह पहला चरण है। फिर तुम और गति करने के लिए स्‍वतंत्र हो। शरीर से मुक्‍त होकर, तादात्‍म्‍य से मुक्‍त होकर तुम अपने मन की गहराइयों में प्रवेश कर सकते हो। अब तुम उन नौ पर्तों में, जो भीतर है और अचेतन है, प्रवेश कर सकते हो।यह मन की अंतरस्‍थ गुफा है। और अगर मन की गुफा में प्रवेश करते हो तो तुम मन से भी प्रथक हो जाते हो। तब तुम देखोगें कि मन भी एक विषय है जिसे देखा जा सकता है। और जो मन में प्रवेश कर रहा है वह मन से पृथक और भिन्‍न है। अंतरस्‍थ अस्‍तित्‍व को विस्‍तार से देखने का यही अर्थ है ..मन में प्रवेश करो। शरीर और मन दोनों के भीतर जाना है। और भीतर से उन्‍हें देखना है। तब तुम केवल साक्षी हो। और इस साक्षी में प्रवेश नहीं हो सकता। इसी से यह तुम्‍हारा अंतरतम है; यही तुम हो। जिसमें प्रवेश किया जा सकता है ,जिसे देखा जा सकता है। जब तुम वहां आ गए जिससे आगे नहीं जाया जा सकता, जिसमें प्रवेश नहीं किया जा सकता, वह तुम नहीं हो।तभी तुम समझना कि तुम अपने सच्‍चे 'स्‍व' के पास, अपनी आत्‍मा के पास पहुंचे हो।

क्या हम आत्‍मा के साक्षी हो सकते है?-

05 FACTS;-

1-स्‍मरण रहे कि तुम साक्षी के साक्षी नहीं हो सकते। अगर कोई कहता है कि मैंने अपने साक्षी को देखा है तो वह गलत कहता है। जिसे तुम देख सकते हो वह तुम नहीं हो। जिसका तुम निरीक्षण कर सकते हो वह तुम नहीं हो। जिसका तुम्‍हें बोध हो सकता है कि वह तुम नहीं हो।अगर तुम ने साक्षी आत्‍मा को देख लिया तो वह साक्षी आत्‍मा ही नहीं है। क्योंकि तुम अपने अखंड अस्‍तित्‍व को दो में या दृश्‍य और द्रष्‍टा में नहीं बांट सकते।लेकिन मन के पार एक बिंदु आता है। जहां तुम मात्र होते हो। अब वहां केवल द्रष्‍टा है, मात्र साक्षी भाव है। इस बात को बुद्धि से तर्क से समझना बहुत कठिन है। क्‍योंकि वहां बुद्धि की सभी कोटियां समाप्‍त हो जाती है।

2-ज्ञान का अर्थ है द्वैत अथार्त विषय और विषयी के बीच, ज्ञाता और ज्ञात/knower and known के बीच। इसलिए चार्वाक, जिसने संसार के एक अत्‍यंत तर्कपूर्ण दर्शनशास्‍त्र की स्‍थापना की;कहता है कि जो लोग कहते है कि हमने आत्‍मा को जान लिया है वे मूढ़ता की बात करते है। आत्‍म ज्ञान असंभव है क्‍योंकि आत्‍मा निर्विवाद रूप से जानने वाला है। उसे जाना जाने वाले में बदला नहीं जा सकता। और तब चार्वाक कहता है कि अगर तुम आत्‍मा को नहीं जान सकते; तो यह कैसे कह सकते हो कि आत्‍मा है।तर्क की इस कठिनाई के कारण चार्वाक ने कहा कि तुम आत्‍मा को नहीं जान सकते हो, कोई आत्‍म-ज्ञान नहीं होता। और इसलिए तुम कैसे कह सकते हो कि आत्‍मा है। जो भी तुम जानते हो वह आत्‍मा नहीं है। जो जानता है वह आत्‍मा है। जो जाना जाता है वह आत्‍मा नहीं हो सकती है। क्‍योंकि तब कौन जानेगा और किसको जानेगा? इसलिए तुम तर्क के अनुसार नहीं कह सकते ,कि मैंने अपनी आत्‍मा को जान लिया। वह बेतुका है, तर्कहीन है।

3- चार्वाक जैसे लोग, जो आत्‍मा के अस्‍तित्‍व में विश्‍वास नहीं रखते, अनात्मवादी कहलाते है। वे कहते है कि आत्‍मा नहीं है; क्योकि उसे जाना नहीं जा सकता है।अगर तर्क ही सब कुछ है तो वे सही है। लेकिन जीवन का यह रहस्‍य है कि तर्क सिर्फ आरंभ है, अंत नहीं है। एक क्षण आता है ,जब तर्क समाप्‍त हो जाता है। लेकिन तुम समाप्‍त , नहीं होते हो तुम तब भी होते हो। जीवन अतर्क्‍य है। यही कारण है कि यह समझना बहुत कठिन होता है कि सिर्फ साक्षी बचता है।आकाश को देखो ;नीला दिखाई देता है। लेकिन आकाश नीला नहीं है। वह कॉस्मिक किरणों (Galactic Cosmic Rays) से भरा है। क्‍योंकि वहां कोई विषय वस्‍तु नहीं है। इसीलिए आकाश नीला दिखाई देता है। वे किरणें प्रतिबिंबित नहीं कर सकती, तुम्‍हारी आंखों तक नहीं आ सकती। अगर तुम अंतरिक्ष में जाओ और वहां कोई वस्‍तु न हो तो तुम्‍हें वहां अँधेरा ही अँधेरा मालूम होगा जबकि तुम्‍हारे बगल से किरण गुजर रही है। प्रकाश को जानने के लिए विषय वस्‍तु का होना अनिवार्य है।

4- तो चार्वाक कहता है कि अगर तुम भीतर जाते हो और उस बिंदु पर पहुंचते हो जहां सिर्फ साक्षी बचता है। और कुछ देखने को नहीं बचता। देखने के लिए कोई विषय अवश्‍य चाहिए। तभी तुम साक्षित्‍व को जान सकते हो। तर्क के अनुसार, विज्ञान के अनुसार यह सही है। लेकिन यह अस्‍तित्‍वत: यही नहीं है। जो लोग सचमुच भीतर प्रवेश करते है वे ऐसे बिंदु पर पहुंचते है जहां मात्र चैतन्‍य के अतिरिक्‍त कोई भी विषय नहीं रहता है। तुम हो, लेकिन देखने को कुछ भी नहीं है ...एक मात्र मात्र दृष्‍टा है।
अपने आस-पास किसी विषय के बिना, शुद्ध विषयी होता है। जिस क्षण तुम इस बिंदू पर पहुंचते हो। तुम अपने अस्‍तित्‍व के परम लक्ष्‍य पर पहुंच गए। उसे तुम 'आदि 'कह सकते हो। उसे तुम 'अंत' भी कह सकते हो। वह 'आदि 'और 'अंत 'दोनों है। वह आत्‍म-ज्ञान है।

5- भाषागत रूप से आत्‍म ज्ञान शब्‍द गलत है। क्‍योंकि भाषा में इसके संबंध में कुछ भी नहीं कहा जा सकता। जब तुम अद्वैत के जगत में प्रवेश करते हो, तो भाषा व्‍यर्थ हो जाती है। भाषा तभी तक सार्थक है जब तक तुम द्वैत के जगत में हो। द्वैत के जगत में भाषा अर्थवान है; क्‍योंकि भाषा द्वैतवादी जगत की कृति है। उसका हिस्‍सा है। अद्वैत में प्रवेश करते ही भाषा व्‍यर्थ हो

जाती है।चायनीज फिलॉसफर लाओत्‍से ने कहा है कि जो कहा जा सकता है वह सच नहीं हो सकता और जो सच है वह कहा नहीं जा सकता। वह मौन रह गया। जिंदगी के अंतिम दिनों तक उसने कुछ भी लिखने से इनकार किया। उसने कहा कि अगर मैं कुछ कहूं तो वह असत्‍य हो जाएगा। क्‍योंकि उस जगत के संबंध में कुछ भी नहीं कहा जा सकता जहां एक ही बचता है।
आंखे बंद करके अपने अंतरस्‍थ अस्‍तित्‍व ...शरीर और मन दोनों को विस्‍तार से देखो।इस प्रकार अपने सच्‍चे स्‍वभाव को देख लो।

इस विधि का प्रयोग कैसे करे?-

03 FACTS;-

1- अगर तुम इस विधि का प्रयोग करते हो तो पहले आंखों को समग्र रूप से बंद होना जरूरी है और फिर आंखों की सारी गति रोक दो ; पत्‍थर की तरह हो जाने दो। इसका अभ्यास करते हुए किसी दिन अचानक, हठात तुम अपने अंदर देखने में समर्थ हो जाओगे।वे आंखें जो सतत बाहर देखने की आदी थी; भीतर को मुड़ जाएंगी।और तुम्‍हें अपने अंतरस्‍थ की एक झलक मिल जायेगी। फिर कोई कठिनाई नहीं रहेगी। एक बार तुम्‍हें अंतरस्‍थ की झलक मिल गई तो तुम जान लेते हो कि क्‍या किया जाए और कैसे गति की जाए। परन्तु झलक कठिन है. उसके बाद तुम्‍हें तरकीब हाथ लग जायेगी। तब वह एक खेल, एक युक्‍ति की बात हो जाएगी, किसी भी क्षण तुम अपनी आंखे बंद कर सकते हो।

2-उदाहरण के लिए गौतम बुद्ध के जीवन का अंतिम दिन था।उनकी इस आंतरिक यात्रा के चार चरण थे।पहले उन्‍होंने आंखें बंद की और तब उन्‍होंने आंखों को स्‍थिर कर लिया। यह दूसरी बात है। और तीसरी बात कि उन्‍होंने अपने शरीर को देखा और अंत में अपने केंद्र पर, मूलस्‍त्रोत पर पहुंच गए।यह वजह है कि उनकी मृत्‍यु नहीं कहलाती। हम उसे निर्वाण कहते है। सामान्‍यत: हम मरते है, क्‍योंकि हमारी मृत्‍यु घटित होती है। गौतम बुद्ध के साथ यह मृत्‍यु घटित नहीं हुई। मृत्‍यु के आने के पहले वे अपने स्‍त्रोत को वापस लौट गए थे। उनके मृत शरीर की ही मृत्‍यु हुई। वे वहां मौजूद नहीं थे।

3-बौद्ध परंपरा में कहा जाता है कि गौतम बुद्ध की कभी मृत्‍यु नहीं घटित हुई; मृत्‍यु उन्‍हें पकड़ ही नहीं पाई। मृत्‍यु ने उनका पीछा किया। जैसे कि वह सबका पीछा करती है। लेकिन वे उसके जाल में नहीं आए। मृत्‍यु उनके द्वारा छली गई। गौतम बुद्ध मृत्‍यु के पार खड़े होकर हंस रहे होंगे। क्‍योंकि मृत्‍यु मृत शरीर के पास खड़ी थी। यह वही विधि है इसके चार चरण करो और आगे बढ़ो। और जब एक झलक मिल जाएगी तो पूरी चीज आसान और सरल हो जाएगी। तब तुम किसी भी क्षण अंदर जा सकते हो। और बाहर आ सकते हो वैसे ही जैसे तुम अपने घर के बाहर-भीतर होते हो।

विज्ञान भैरव तंत्र की ध्यान संबंधित 30वीं विधि(देखने की सात विधियां) का क्या विवेचन है?



विज्ञान भैरव तंत्र की ध्यान विधि–30;-

07 FACTS;-

1-भगवान शिव कहते है:-.
''आंखें बंद करके अपने अंतरस्‍थ अस्‍तित्‍व को विस्‍तार से देखो। इस प्रकार अपने सच्‍चे स्‍वभाव को देख लो।''

2-‘ अपनी आंखें बंद कर लो। लेकिन आंखे बंद करना ही काफी नहीं है।उसका अर्थ है कि आँखो को बंद करके उनकी गति भी रोक दो ..समग्र रूप से बंद कर लो।अन्‍यथा आंखें बाहर की ही चीजें देखती रहेगी।बंद आंखें भी प्रतिबिंबों को देखती है। असली चीजें तो नहीं रहती। लेकिन उनके चित्र, विचार, संचित यादें तब भी सामने तैरती रहेंगी।इसलिए जब तक को वे तैरती रहेगी ;तब तक आंखों को समग्ररूपेण बंद मत समझो। समग्र रूप से बंद होने का अर्थ है कि अब देखने को कुछ भी नहीं है। इस फर्क को ठीक से समझना है। हर कोई ,हर क्षण आंखें बंद करता है। रात में भी तुम आंखें बंद रखते हो। लेकिन इससे अंतरस्‍थ स्‍वभाव प्रकट नहीं हो जाएगा। आंखें ऐसे बंद करो कि देखने को कुछ भी न बचे—न बाहर का विषय बचे न भीतर का विषय बचे। तुम्‍हारे सामने बस खाली अँधेरा रह जाए, मानो तुम अचानक अंधे हो गए हो ..यथार्थ के प्रति ही नहीं, स्‍वप्‍न वाले यथार्थ के प्रति भी।

3- इसमे एक लंबे अभ्‍यास की जरूरत पड़ेगी। यह अचानक संभव नहीं है। जब भी तुम्‍हें लगे कि यह आसानी से किया जा सकता है और जब भी तुम्‍हें समय हो आंखें बंद कर लो और आंखों की सभी भीतरी हलचल को भी बंद कर दो।आंखों की किसी तरह की भी गति मत होने दो। भाव करो ,कि आंखें पत्‍थर हो गई है। और तब आंखों की पथराई अवस्‍था में ठहरे रहो। कुछ भी मत करो; मात्र स्‍थित रहो। तब किसी दिन अचानक तुम्‍हें यह बोध होगा कि तुम अपने भीतर देख रहे हो।
यह विधि भीतर से देखने के लिए बहुत सहयोगी है। और यह दर्शन तुम्‍हारी समग्र चेतना को, तुम्‍हारे समूचे अस्‍तित्‍व को रूपांतरित कर देता है। कारण यह है कि जब तुम अपने को भी भीतर से देखते हो तो तुम तुरंत संसार से भिन्‍न हो जाते हो। यह झूठा तादात्‍म्‍य/ false identification , कि मैं शरीर हूं, इसलिए है क्योंकि हम अपने शरीर को बाहर से देखते है। अगर कोई उसे भीतर से देख सके तो द्रष्‍टा शरीर से भिन्‍न हो जाता है। और तब तुम अपनी चेतना को ,अंगूठे से सिर तक अपने शरीर के भीतर गति कर सकते हो; परिभ्रमण कर सकते हो।

4- और एक बार तुम शरीर को अंदर से देखने और उसमें गति करने में समर्थ हो गए , एक बार तुम ने जान लिया कि तुम शरीर से पृथक हो, तो तुम एक महा बंधन से मुक्‍त हो गए। अब तुम पर गुरूत्‍वाकर्षण की पकड़ न रही , कोई सीमा न रही। अब तुम परिपूर्ण स्‍वतंत्र हो, अब तुम शरीर के बाहर जा सकते हो। अब बाहर-भीतर होना आसान है। अब तुम्‍हारा शरीर महज निवास स्‍थान है।आंखें बंद करो और अपने अंतरस्‍थ प्राणी को विस्‍तार से देखो। और भीतर-भीतर शरीर के अंग-अंग में परिभ्रमण करो। सबसे पहले अंगूठे के पास जाओ। पूरे शरीर को भूल जाओ। और अंगूठे पर पहु्ंचो। वहां रुको और उसका दर्शन करो। फिर पाँव से होकर ऊपर बढ़ो; और ऐसे प्रत्‍येक अंग को देखो।

5- तब बहुत सी बातें घटित होंगी और तुम्‍हारा शरीर ऐसा संवेदनशील वाहन बन जाएगा जिसका तुम कल्‍पना नहीं कर सकते। तब अगर तुम किसी को स्‍पर्श करोगे तो तुम पूरे अपने हाथ में गति कर जाओगे और वह स्‍पर्श रूपांतरकारी होगा।महान गुरु के स्‍पर्श का यही अर्थ है कि वह अपने किसी अंग में भी समग्र रूप से पहुंच सकता है और वहां एकाग्र हो सकता है।अगर तुम समग्र रूप से अपने किसी अंग में चले जाओ तो वह अंग जीवंत हो जाता है। इतना जीवंत कि तुम कल्‍पना भी नहीं कर सकते कि उसे क्‍या हो गया है। तब तुम अपनी आंखों में समग्ररूपेण समा सकते हो। इस तरह आँखो में समाकर अगर तुम किसी दूसरे की आंखों में झांकोगे तो तुम उसमें प्रवेश कर जाओगे उसकी गहनत्म गहराई को छू जाओगे।

6-एक महान गुरु अनेक काम करता है। उनमें से एक बुनियादी काम यह है कि तुम्‍हारा विश्‍लेषण करने के लिए तुममें गहरे उतरता है। और वह तुम्‍हारे अंधेरे तल घरों में प्रवेश करता है। तुम्‍हें भी अपने इन तल घरों का पता नहीं है। अगर गुरु कहेगा कि तुम्‍हारे भीतर कुछ चीजें छिपी पड़ी है, तो तुम उसका विश्‍वास भी नहीं करोगे क्योंकि तुम्‍हें उनका पता ही नहीं है। तुम अपने मन के एक ही हिस्‍से को जानते हो और वह उसका बहुत छोटा हिस्सा ,ऊपरी हिस्‍सा है या पहली पर्त भर है। उसके पीछे नौ पर्तें छिपी है जिनकी तुम्‍हें कोई खबर नहीं है। लेकिन आंखों के द्वारा उनमें प्रवेश किया जा सकता है।
आंखें बंद करके अपने अंतरस्‍थ अस्‍तित्‍व को विस्‍तार से देखना अथार्त अपने शरीर को भीतर से, अपने आंतरिक केंद्र से देखना है। केंद्र पर खड़े हो जाओ और देखो। तब तुम शरीर से पृथक हो जाओगे। क्‍योंकि द्रष्‍टा कभी दृश्‍य नहीं होता है, निरीक्षक अपने विषय से भिन्‍न होता है। अगर तुम अंदर से अपने शरीर को देख सको तो तुम कभी फिर इस भ्रम में नहीं पड़ोगे कि मैं शरीर हूं। तब तुम सर्वथा पृथक रहोगे ... शरीर में रहोगे लेकिन शरीर नहीं रहोगे।

7- यह पहला चरण है। फिर तुम और गति करने के लिए स्‍वतंत्र हो। शरीर से मुक्‍त होकर, तादात्‍म्‍य से मुक्‍त होकर तुम अपने मन की गहराइयों में प्रवेश कर सकते हो। अब तुम उन नौ पर्तों में, जो भीतर है और अचेतन है, प्रवेश कर सकते हो।यह मन की अंतरस्‍थ गुफा है। और अगर मन की गुफा में प्रवेश करते हो तो तुम मन से भी प्रथक हो जाते हो। तब तुम देखोगें कि मन भी एक विषय है जिसे देखा जा सकता है। और जो मन में प्रवेश कर रहा है वह मन से पृथक और भिन्‍न है। अंतरस्‍थ अस्‍तित्‍व को विस्‍तार से देखने का यही अर्थ है ..मन में प्रवेश करो। शरीर और मन दोनों के भीतर जाना है। और भीतर से उन्‍हें देखना है। तब तुम केवल साक्षी हो। और इस साक्षी में प्रवेश नहीं हो सकता। इसी से यह तुम्‍हारा अंतरतम है; यही तुम हो। जिसमें प्रवेश किया जा सकता है ,जिसे देखा जा सकता है। जब तुम वहां आ गए जिससे आगे नहीं जाया जा सकता, जिसमें प्रवेश नहीं किया जा सकता, वह तुम नहीं हो।तभी तुम समझना कि तुम अपने सच्‍चे 'स्‍व' के पास, अपनी आत्‍मा के पास पहुंचे हो।

क्या हम आत्‍मा के साक्षी हो सकते है?-

05 FACTS;-

1-स्‍मरण रहे कि तुम साक्षी के साक्षी नहीं हो सकते। अगर कोई कहता है कि मैंने अपने साक्षी को देखा है तो वह गलत कहता है। जिसे तुम देख सकते हो वह तुम नहीं हो। जिसका तुम निरीक्षण कर सकते हो वह तुम नहीं हो। जिसका तुम्‍हें बोध हो सकता है कि वह तुम नहीं हो।अगर तुम ने साक्षी आत्‍मा को देख लिया तो वह साक्षी आत्‍मा ही नहीं है। क्योंकि तुम अपने अखंड अस्‍तित्‍व को दो में या दृश्‍य और द्रष्‍टा में नहीं बांट सकते।लेकिन मन के पार एक बिंदु आता है। जहां तुम मात्र होते हो। अब वहां केवल द्रष्‍टा है, मात्र साक्षी भाव है। इस बात को बुद्धि से तर्क से समझना बहुत कठिन है। क्‍योंकि वहां बुद्धि की सभी कोटियां समाप्‍त हो जाती है।

2-ज्ञान का अर्थ है द्वैत अथार्त विषय और विषयी के बीच, ज्ञाता और ज्ञात/knower and known के बीच। इसलिए चार्वाक, जिसने संसार के एक अत्‍यंत तर्कपूर्ण दर्शनशास्‍त्र की स्‍थापना की;कहता है कि जो लोग कहते है कि हमने आत्‍मा को जान लिया है वे मूढ़ता की बात करते है। आत्‍म ज्ञान असंभव है क्‍योंकि आत्‍मा निर्विवाद रूप से जानने वाला है। उसे जाना जाने वाले में बदला नहीं जा सकता। और तब चार्वाक कहता है कि अगर तुम आत्‍मा को नहीं जान सकते; तो यह कैसे कह सकते हो कि आत्‍मा है।तर्क की इस कठिनाई के कारण चार्वाक ने कहा कि तुम आत्‍मा को नहीं जान सकते हो, कोई आत्‍म-ज्ञान नहीं होता। और इसलिए तुम कैसे कह सकते हो कि आत्‍मा है। जो भी तुम जानते हो वह आत्‍मा नहीं है। जो जानता है वह आत्‍मा है। जो जाना जाता है वह आत्‍मा नहीं हो सकती है। क्‍योंकि तब कौन जानेगा और किसको जानेगा? इसलिए तुम तर्क के अनुसार नहीं कह सकते ,कि मैंने अपनी आत्‍मा को जान लिया। वह बेतुका है, तर्कहीन है।

3- चार्वाक जैसे लोग, जो आत्‍मा के अस्‍तित्‍व में विश्‍वास नहीं रखते, अनात्मवादी कहलाते है। वे कहते है कि आत्‍मा नहीं है; क्योकि उसे जाना नहीं जा सकता है।अगर तर्क ही सब कुछ है तो वे सही है। लेकिन जीवन का यह रहस्‍य है कि तर्क सिर्फ आरंभ है, अंत नहीं है। एक क्षण आता है ,जब तर्क समाप्‍त हो जाता है। लेकिन तुम समाप्‍त , नहीं होते हो तुम तब भी होते हो। जीवन अतर्क्‍य है। यही कारण है कि यह समझना बहुत कठिन होता है कि सिर्फ साक्षी बचता है।आकाश को देखो ;नीला दिखाई देता है। लेकिन आकाश नीला नहीं है। वह कॉस्मिक किरणों (Galactic Cosmic Rays) से भरा है। क्‍योंकि वहां कोई विषय वस्‍तु नहीं है। इसीलिए आकाश नीला दिखाई देता है। वे किरणें प्रतिबिंबित नहीं कर सकती, तुम्‍हारी आंखों तक नहीं आ सकती। अगर तुम अंतरिक्ष में जाओ और वहां कोई वस्‍तु न हो तो तुम्‍हें वहां अँधेरा ही अँधेरा मालूम होगा जबकि तुम्‍हारे बगल से किरण गुजर रही है। प्रकाश को जानने के लिए विषय वस्‍तु का होना अनिवार्य है।

4- तो चार्वाक कहता है कि अगर तुम भीतर जाते हो और उस बिंदु पर पहुंचते हो जहां सिर्फ साक्षी बचता है। और कुछ देखने को नहीं बचता। देखने के लिए कोई विषय अवश्‍य चाहिए। तभी तुम साक्षित्‍व को जान सकते हो। तर्क के अनुसार, विज्ञान के अनुसार यह सही है। लेकिन यह अस्‍तित्‍वत: यही नहीं है। जो लोग सचमुच भीतर प्रवेश करते है वे ऐसे बिंदु पर पहुंचते है जहां मात्र चैतन्‍य के अतिरिक्‍त कोई भी विषय नहीं रहता है। तुम हो, लेकिन देखने को कुछ भी नहीं है ...एक मात्र मात्र दृष्‍टा है।
अपने आस-पास किसी विषय के बिना, शुद्ध विषयी होता है। जिस क्षण तुम इस बिंदू पर पहुंचते हो। तुम अपने अस्‍तित्‍व के परम लक्ष्‍य पर पहुंच गए। उसे तुम 'आदि 'कह सकते हो। उसे तुम 'अंत' भी कह सकते हो। वह 'आदि 'और 'अंत 'दोनों है। वह आत्‍म-ज्ञान है।

5- भाषागत रूप से आत्‍म ज्ञान शब्‍द गलत है। क्‍योंकि भाषा में इसके संबंध में कुछ भी नहीं कहा जा सकता। जब तुम अद्वैत के जगत में प्रवेश करते हो, तो भाषा व्‍यर्थ हो जाती है। भाषा तभी तक सार्थक है जब तक तुम द्वैत के जगत में हो। द्वैत के जगत में भाषा अर्थवान है; क्‍योंकि भाषा द्वैतवादी जगत की कृति है। उसका हिस्‍सा है। अद्वैत में प्रवेश करते ही भाषा व्‍यर्थ हो

जाती है।चायनीज फिलॉसफर लाओत्‍से ने कहा है कि जो कहा जा सकता है वह सच नहीं हो सकता और जो सच है वह कहा नहीं जा सकता। वह मौन रह गया। जिंदगी के अंतिम दिनों तक उसने कुछ भी लिखने से इनकार किया। उसने कहा कि अगर मैं कुछ कहूं तो वह असत्‍य हो जाएगा। क्‍योंकि उस जगत के संबंध में कुछ भी नहीं कहा जा सकता जहां एक ही बचता है।
आंखे बंद करके अपने अंतरस्‍थ अस्‍तित्‍व ...शरीर और मन दोनों को विस्‍तार से देखो।इस प्रकार अपने सच्‍चे स्‍वभाव को देख लो।

इस विधि का प्रयोग कैसे करे?-

03 FACTS;-

1- अगर तुम इस विधि का प्रयोग करते हो तो पहले आंखों को समग्र रूप से बंद होना जरूरी है और फिर आंखों की सारी गति रोक दो ; पत्‍थर की तरह हो जाने दो। इसका अभ्यास करते हुए किसी दिन अचानक, हठात तुम अपने अंदर देखने में समर्थ हो जाओगे।वे आंखें जो सतत बाहर देखने की आदी थी; भीतर को मुड़ जाएंगी।और तुम्‍हें अपने अंतरस्‍थ की एक झलक मिल जायेगी। फिर कोई कठिनाई नहीं रहेगी। एक बार तुम्‍हें अंतरस्‍थ की झलक मिल गई तो तुम जान लेते हो कि क्‍या किया जाए और कैसे गति की जाए। परन्तु झलक कठिन है. उसके बाद तुम्‍हें तरकीब हाथ लग जायेगी। तब वह एक खेल, एक युक्‍ति की बात हो जाएगी, किसी भी क्षण तुम अपनी आंखे बंद कर सकते हो।

2-उदाहरण के लिए गौतम बुद्ध के जीवन का अंतिम दिन था।उनकी इस आंतरिक यात्रा के चार चरण थे।पहले उन्‍होंने आंखें बंद की और तब उन्‍होंने आंखों को स्‍थिर कर लिया। यह दूसरी बात है। और तीसरी बात कि उन्‍होंने अपने शरीर को देखा और अंत में अपने केंद्र पर, मूलस्‍त्रोत पर पहुंच गए।यह वजह है कि उनकी मृत्‍यु नहीं कहलाती। हम उसे निर्वाण कहते है। सामान्‍यत: हम मरते है, क्‍योंकि हमारी मृत्‍यु घटित होती है। गौतम बुद्ध के साथ यह मृत्‍यु घटित नहीं हुई। मृत्‍यु के आने के पहले वे अपने स्‍त्रोत को वापस लौट गए थे। उनके मृत शरीर की ही मृत्‍यु हुई। वे वहां मौजूद नहीं थे।

3-बौद्ध परंपरा में कहा जाता है कि गौतम बुद्ध की कभी मृत्‍यु नहीं घटित हुई; मृत्‍यु उन्‍हें पकड़ ही नहीं पाई। मृत्‍यु ने उनका पीछा किया। जैसे कि वह सबका पीछा करती है। लेकिन वे उसके जाल में नहीं आए। मृत्‍यु उनके द्वारा छली गई। गौतम बुद्ध मृत्‍यु के पार खड़े होकर हंस रहे होंगे। क्‍योंकि मृत्‍यु मृत शरीर के पास खड़ी थी। यह वही विधि है इसके चार चरण करो और आगे बढ़ो। और जब एक झलक मिल जाएगी तो पूरी चीज आसान और सरल हो जाएगी। तब तुम किसी भी क्षण अंदर जा सकते हो। और बाहर आ सकते हो वैसे ही जैसे तुम अपने घर के बाहर-भीतर होते हो।

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2021

क्राइसिस मेनेजमेंट ग्रुप की बैठक सम्पन्न, मास्क लगाकर बाहर निकलने तथा अत्यावश्यक होने पर ही यात्रा करने की अपील



खण्डवा - गृह विभाग मध्यप्रदेश शासन के निर्देशों के पालन में मंगलवार को  क्राइसिस मेनेजमेंट ग्रुप की बैठक सम्पन्न हुई। बैठक में विधायक श्री देवेन्द्र वर्मा, कलेक्टर श्री अनय द्विवेदी, पुलिस अधीक्षक श्री विवेक सिंह, जिला पंचायत की मुख्य कार्यपालन अधिकारी श्रीमती नंदा भलावे कुशरे, चेम्बर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष श्री गुरमीत सिंह उबेजा सहित विभिन्न जनप्रतिनिधि व अधिकारीगण मौजूद थे। बैठक में नागरिकों को मास्क लगाने के लिए प्रेरित करने तथा सोशल डिस्टेंसिंग के प्रावधानों का पालन करने के संबंध में अपील की गई।

कलेक्टर श्री द्विवेदी व विधायक श्री वर्मा ने की नागरिकों से अपील

विधायक श्री वर्मा ने नागरिकों से अपील की है कि वे अत्यावश्यक होने पर ही महाराष्ट्र या अन्य कोरोना संक्रमित क्षेत्रों की यात्रा पर जायें। उन्होंने नागरिकों से नियमित रूप से मास्क लगाने तथा सेनेटाइजर का बार-बार प्रयोग करने की अपील भी की है। बैठक में कलेक्टर श्री द्विवेदी ने नागरिकों से अपील की कि वे अत्यावश्यक होने पर ही अमरावती व महाराष्ट्र के अन्य क्षेत्रों की यात्रा करें तथा अनावश्यक यात्रा न करें।

बैठक में ये निर्णय लिये गए

बैठक में निर्णय लिया गया कि महाराष्ट्र सीमा से लगी सड़कों पर चेक पोस्ट लगाकर वहां से आने वाले लोगों की ऑक्सीजन सेचुरेशन का स्तर तथा शरीर का तापमान नापने की कार्यवाही की जायेगी। जिले में ऐसे मेलों के आयोजन की अनुमति नही दी जायेगी, जिनमें महाराष्ट्र व अन्य क्षेत्रों से नागरिकगण आते है। बैठक में तय किया गया कि केवल ऐसे मेलों के आयोजन की ही अनुमति दी जायेगी, जिनमें केवल स्थानीय नागरिक ही शामिल होते है। बैठक में निर्णय लिया गया कि शादी, समारोह में महाराष्ट्र के विभिन्न जिलों से यदि मेहमान आकर शामिल होते है तो उसकी सूचना जिला प्रशासन को अवश्य दी जायें।

कलेक्टर श्री द्विवेदी ने दिए निर्देश

कलेक्टर श्री द्विवेदी ने रेल्वे स्टेशन एवं बस स्टेण्ड पर महाराष्ट्र की ओर से आने वाले यात्रियों की स्क्रीनिंग के लिए आवश्यक व्यवस्था करने के निर्देश भी बैठक में दिए। उन्होंने कहा कि नेहरू युवा केन्द्र, एनसीसी, राष्ट्रीय सेवा योजना, जन अभियान परिषद के अलावा अन्य समाजसेवी संगठनों के कार्यकर्ताओं की मदद से शहर में मास्क लगाने के लिए लोगों को प्रेरित करने के लिए अभियान प्रारंभ किया जाये। उन्होंने कहा कि विभिन्न होटल्स में महाराष्ट्र के विभिन्न जिलों से आने वाले यात्रियों की जानकारी भी ली जायें तथा उनके स्वास्थ्य की जांच भी नियमित रूप से की जाये, ताकि कोरोना संक्रमण का खतरा न रहे।

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

"नर्मदा प्रकाट्य उत्सव" पर शिप्रा ने लिया १ करोड़ वृक्ष का संकल्प





खण्डवा- नर्मदा जी का प्राकट्य उत्सव शिप्रा अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण दिन मानती है।इस दिन को विशेष तौर पर मनाने के लिए शिप्रा गंगा के तट उत्तर प्रदेश से नर्मदा के तट ओमकारेश्वर पहुँची।माँ नर्मदा के जन्मोत्सव पर उन्होंने एक करोड़ वृक्ष लगाने का वट वृक्ष संकल्प लिया। शिप्रा का जन्म उत्तर प्रदेश के बदायूँ जिले के दातागंज में ब्राह्मण कुल के पाठक परिवार मे हुआ। पिता का नाम डॉ शैलेश पाठक जी समाज सेवक धार्मिक, परोपकारी,संगृहीत -सन्त एवं कर्म योगी,जन नेता है जो अपनी माँ की राजनीतिक विरासत को अपने कर्मों से सिंचित कर रहे है।
एक बड़ी राजनीतिक विरासत का हिस्सा रही शिप्रा जहां उनकी दादी दातागंज क्षेत्र से कई बार विधायक रही, वहीं शिप्रा का एकलौता भैया अंकित पाठक खाद के बिज़नेस से लेकर कई छोटे बड़े स्कूल को सम्भालता है। 
धर्म से ओत प्रोत शिप्रा की माँ बालिकाओं को शिक्षा के प्रति जागरुक करते हुए एक स्कूल की प्रबंधक है
शिप्रा ने अंग्रेजी साहित्य से एम ए की उपाधि प्राप्त कर व्यवसाय मे प्रवृत्त हुई ।इवेंट का काम बड़े पैमाने पर देश विदेश में फैलाया।एक सुविधापूर्ण जीवन को अपनी दम सम्भालते हुए पद,धन और प्रतिष्ठा प्राप्त की।किन्तु इस विधा से वह सन्तुष्ट नही हुई और उसने अपना मार्ग बदल लिया और यही मार्ग उसकी नियति बन गई है। बिज़नेस के साथ साथ शिप्रा अपनी माँ से धर्म की शिक्षा लेती रही।भारत के लगभग सभी सिद्ध स्थानो की यात्रा की। शिप्रा ने चार धाम,सप्तपुरी,११ ज्योतिर्लिंग दर्शन किए।
गोवर्धन परिक्रमा,बिहारी जी परिक्रमा,मनक़ामेश्वर परिक्रमा,कैलाश मानसरोवर दर्शन किए।
आध्यात्म को जीवन का धरातल बनाने वाली शिप्रा के जीवन में एक बड़ा सार्थक बदलाव तब आया जब उन्होंने माँ नर्मदा की 3500 किलो मीटर की पैदल परिक्रमा की।ये परिक्रमा शिप्रा ने अकेले भिक्षा वृत्ति में की। परिक्रमा पूर्ण होने के बाद शिप्रा का माँ के प्रति लगाव और समर्पण इतना बड़ गया कि अपना बिज़नेस छोड़ कर शिप्रा पूरी तरह माँ नर्मदा को समर्पित हो गयी। हर घाट को स्वच्छ रखने हेतु उन्होंने "ग्लोजल संस्था" बनायी जिसके अंतर्गत ये कार्य आरंभ किया कि नर्मदा से लेकर गंगातक,गोदावरी से लेकर ब्रह्मपुत्र तक सभी नदियों के जल को सहेजा जाए।


इसी मुहिम में शिप्रा ने ग्लोजल फ़ाउंडेशन के तले एक "जल शपथ" कार्यक्रम आयोजित किया जिस में हर क्षेत्र के लोगों ने जल बचाने की शपथ ली भी और दिलायी भी। इस जल शपथ में माननीय मुख्यमंत्री से लेकर ज़िलाधिकारी तक,सिद्ध संतो से लेकर भक्तों तक सभी ने जल के प्रति अपना समर्पण दिखाया।
माँ नर्मदा के प्राकट्य उत्सव को सार्थक बनाने हेतु शिप्रा ने ओमकारेश्वर के घाट पर १ करोड़ वृक्ष लगाने का संकल्प लिया।इस संकल्प में उन्होंने अपने राष्ट्रीय वृक्ष को प्राथमिकता देते हुए एक बड़ी संख्या में वट वृक्ष एवं बाक़ी देव वृक्ष लगाने का संकल्प लिया।इन देव वृक्षों में शिव को प्रिय रुद्राक्ष,महाराष्ट्र के आध्यात्म के प्रतीक अवधूम्बर,वैज्ञानिक दृष्टि से सर्वोत्तम पीपल एवं सभी तरह के यज्ञ,हवन में काम आने वाले आम,विष्णु को प्रिय आँवला,पाकड,नीम जैसे औषधीयुक्त वृक्षों का चयन किया।

शिप्रा का मानना है कि जल और वृक्ष एक दूसरे के पूरक है

पानी जीवन का मुख्य घटक है। पेड़-पौधों से वाष्पीकृत जल ही बादल बन गगन में एकत्रित होता है व अमृत बन पुनः धरती की क्षुधा को शांत करता है।
जल मुहिम शिप्रा ने कई सालो से चला रखी है।इसके कारण ही उन्हें "वॉटर वुमन" की संज्ञा मिली हुई है।
शिप्रा ने आयुर्वेद को बढ़ावा देते हुए लेमन ग्रास,खस,श्यामा तुलसी एवं एलोवेरा की पौध का कार्य आरंभ किया। इस मुहिम में वॉटर वुमन ने सभी का सहयोग माँगा है।अपने संकल्प में नर्मदा से लेकर गंगा तक "देव वृक्ष" लगाने की शपथ ली है। 

वॉटर वुमन का ये संकल्प अपने तक ही नही रहा
उन्होंने नर्मदा के तट से अपने पिताजी को भी गंगा के तट पर वृक्ष लगाने का संकल्प दिलवाया।उन्होंने अपने पिता से ये निवेदन किया कि वो अपने राजनीतिक क्षेत्र में प्रतिदिन एक वृक्ष "रेवा" के नाम से लगायेंगे ताकि हर घर को "रेवा की छाँव" मिले।हर घर शुद्ध हवा से भरा रहे और सभी निरोग रहे।अपने वट वृक्ष संकल्प में प्रथम तल पर शिप्रा आश्रमों में वृक्ष लगाएगी।

"नर्मदा प्रकाट्य उत्सव" पर शिप्रा ने लिया १ करोड़ वृक्ष का संकल्प



खण्डवा- नर्मदा जी का प्राकट्य उत्सव शिप्रा अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण दिन मानती है।इस दिन को विशेष तौर पर मनाने के लिए शिप्रा गंगा के तट उत्तर प्रदेश से नर्मदा के तट ओमकारेश्वर पहुँची।माँ नर्मदा के जन्मोत्सव पर उन्होंने एक करोड़ वृक्ष लगाने का वट वृक्ष संकल्प लिया। शिप्रा का जन्म उत्तर प्रदेश के बदायूँ जिले के दातागंज में ब्राह्मण कुल के पाठक परिवार मे हुआ। पिता का नाम डॉ शैलेश पाठक जी समाज सेवक धार्मिक, परोपकारी,संगृहीत -सन्त एवं कर्म योगी,जन नेता है जो अपनी माँ की राजनीतिक विरासत को अपने कर्मों से सिंचित कर रहे है।
एक बड़ी राजनीतिक विरासत का हिस्सा रही शिप्रा जहां उनकी दादी दातागंज क्षेत्र से कई बार विधायक रही, वहीं शिप्रा का एकलौता भैया अंकित पाठक खाद के बिज़नेस से लेकर कई छोटे बड़े स्कूल को सम्भालता है। 
धर्म से ओत प्रोत शिप्रा की माँ बालिकाओं को शिक्षा के प्रति जागरुक करते हुए एक स्कूल की प्रबंधक है
शिप्रा ने अंग्रेजी साहित्य से एम ए की उपाधि प्राप्त कर व्यवसाय मे प्रवृत्त हुई ।इवेंट का काम बड़े पैमाने पर देश विदेश में फैलाया।एक सुविधापूर्ण जीवन को अपनी दम सम्भालते हुए पद,धन और प्रतिष्ठा प्राप्त की।किन्तु इस विधा से वह सन्तुष्ट नही हुई और उसने अपना मार्ग बदल लिया और यही मार्ग उसकी नियति बन गई है। बिज़नेस के साथ साथ शिप्रा अपनी माँ से धर्म की शिक्षा लेती रही।भारत के लगभग सभी सिद्ध स्थानो की यात्रा की। शिप्रा ने चार धाम,सप्तपुरी,११ ज्योतिर्लिंग दर्शन किए।
गोवर्धन परिक्रमा,बिहारी जी परिक्रमा,मनक़ामेश्वर परिक्रमा,कैलाश मानसरोवर दर्शन किए।
आध्यात्म को जीवन का धरातल बनाने वाली शिप्रा के जीवन में एक बड़ा सार्थक बदलाव तब आया जब उन्होंने माँ नर्मदा की 3500 किलो मीटर की पैदल परिक्रमा की।ये परिक्रमा शिप्रा ने अकेले भिक्षा वृत्ति में की। परिक्रमा पूर्ण होने के बाद शिप्रा का माँ के प्रति लगाव और समर्पण इतना बड़ गया कि अपना बिज़नेस छोड़ कर शिप्रा पूरी तरह माँ नर्मदा को समर्पित हो गयी। हर घाट को स्वच्छ रखने हेतु उन्होंने "ग्लोजल संस्था" बनायी जिसके अंतर्गत ये कार्य आरंभ किया कि नर्मदा से लेकर गंगातक,गोदावरी से लेकर ब्रह्मपुत्र तक सभी नदियों के जल को सहेजा जाए।


इसी मुहिम में शिप्रा ने ग्लोजल फ़ाउंडेशन के तले एक "जल शपथ" कार्यक्रम आयोजित किया जिस में हर क्षेत्र के लोगों ने जल बचाने की शपथ ली भी और दिलायी भी। इस जल शपथ में माननीय मुख्यमंत्री से लेकर ज़िलाधिकारी तक,सिद्ध संतो से लेकर भक्तों तक सभी ने जल के प्रति अपना समर्पण दिखाया।
माँ नर्मदा के प्राकट्य उत्सव को सार्थक बनाने हेतु शिप्रा ने ओमकारेश्वर के घाट पर १ करोड़ वृक्ष लगाने का संकल्प लिया।इस संकल्प में उन्होंने अपने राष्ट्रीय वृक्ष को प्राथमिकता देते हुए एक बड़ी संख्या में वट वृक्ष एवं बाक़ी देव वृक्ष लगाने का संकल्प लिया।इन देव वृक्षों में शिव को प्रिय रुद्राक्ष,महाराष्ट्र के आध्यात्म के प्रतीक अवधूम्बर,वैज्ञानिक दृष्टि से सर्वोत्तम पीपल एवं सभी तरह के यज्ञ,हवन में काम आने वाले आम,विष्णु को प्रिय आँवला,पाकड,नीम जैसे औषधीयुक्त वृक्षों का चयन किया।

शिप्रा का मानना है कि जल और वृक्ष एक दूसरे के पूरक है

पानी जीवन का मुख्य घटक है। पेड़-पौधों से वाष्पीकृत जल ही बादल बन गगन में एकत्रित होता है व अमृत बन पुनः धरती की क्षुधा को शांत करता है।
जल मुहिम शिप्रा ने कई सालो से चला रखी है।इसके कारण ही उन्हें "वॉटर वुमन" की संज्ञा मिली हुई है।
शिप्रा ने आयुर्वेद को बढ़ावा देते हुए लेमन ग्रास,खस,श्यामा तुलसी एवं एलोवेरा की पौध का कार्य आरंभ किया। इस मुहिम में वॉटर वुमन ने सभी का सहयोग माँगा है।अपने संकल्प में नर्मदा से लेकर गंगा तक "देव वृक्ष" लगाने की शपथ ली है। 

वॉटर वुमन का ये संकल्प अपने तक ही नही रहा
उन्होंने नर्मदा के तट से अपने पिताजी को भी गंगा के तट पर वृक्ष लगाने का संकल्प दिलवाया।उन्होंने अपने पिता से ये निवेदन किया कि वो अपने राजनीतिक क्षेत्र में प्रतिदिन एक वृक्ष "रेवा" के नाम से लगायेंगे ताकि हर घर को "रेवा की छाँव" मिले।हर घर शुद्ध हवा से भरा रहे और सभी निरोग रहे।अपने वट वृक्ष संकल्प में प्रथम तल पर शिप्रा आश्रमों में वृक्ष लगाएगी।

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2021

गुप्तनवरात्रि में देवी "छिन्नमस्तिका" साधना



पौरिणीक कथा
〰🌼〰🌼〰
एक बार देवी पार्वती हिमालय भ्रमण कर रही थी उनके साथ उनकी दो सहचरियां जया और विजया भी थीं, हिमालय पर भ्रमण करते हुये वे हिमालय से दूर आ निकली, मार्ग में सुनदर मन्दाकिनी नदी कल कल करती हुई बह रही थी, जिसका साफ स्वच्छ जल दिखने पर देवी पार्वती के मन में स्नान की इच्छा हुई, उनहोंने जया विजया को अपनी मनशा बताती व उनको भी सनान करने को कहा, किन्तु वे दोनों भूखी थी, बोली देवी हमें भूख लगी है, हम सनान नहीं कर सकती, तो देवी नें कहा ठीक है मैं सनान करती हूँ तुम विश्राम कर लो, किन्तु सनान में देवी को अधिक समय लग गया, जया विजया नें पुनह देवी से कहा कि उनको कुछ खाने को चाहिए, देवी सनान करती हुयी बोली कुच्छ देर में बाहर आ कर तुम्हें कुछ खाने को दूंगी, लेकिन थोड़ी ही देर में जया विजया नें फिर से खाने को कुछ माँगा, इस पर देवी नदी से बाहर आ गयी और अपने हाथों में उनहोंने एक दिव्य खडग प्रकट किया व उस खडग से उनहोंने अपना सर काट लिया, देवी के कटे गले से रुधिर की धारा बहने लगी तीन प्रमुख धाराएँ ऊपर उठती हुयी भूमि की और आई तो देवी नें कहा जया विजया तुम दोनों मेरे रक्त से अपनी भूख मिटा लो, ऐसा कहते ही दोनों देवियाँ पार्वती जी का रुधिर पान करने लगी व एक रक्त की धारा देवी नें स्वयं अपने ही मुख में ड़ाल दी और रुधिर पान करने लगी, देवी के ऐसे रूप को देख कर देवताओं में त्राहि त्राहि मच गयी, देवताओं नें देवी को प्रचंड चंड चंडिका कह कर संबोधित किया, ऋषियों नें कटे हुये सर के कारण देवी को नाम दिया छिन्नमस्ता, तब शिव नें कबंध शिव का रूप बना कर देवी को शांत किया, शिव के आग्रह पर पुनह: देवी ने सौम्य रूप बनाया, नाथ पंथ सहित बौद्ध मतावलम्बी भी देवी की उपासना करते हैं, भक्त को इनकी उपासना से भौतिक सुख संपदा वैभव की प्राप्ति, वाद विवाद में विजय, शत्रुओं पर जय, सम्मोहन शक्ति के साथ-साथ अलौकिक सम्पदाएँ प्राप्त होती है, इनकी सिद्धि हो जाने ओपर कुछ पाना शेष नहीं रह जाता,
दस महाविद्यायों में प्रचंड चंड नायिका के नाम से व बीररात्रि कह कर देवी को पूजा जाता है
देवी के शिव को कबंध शिव के नाम से पूजा जाता है। छिन्नमस्ता देवी शत्रु नाश की सबसे बड़ी देवी हैं,भगवान् परशुराम नें इसी विद्या के प्रभाव से अपार बल अर्जित किया था
शास्त्रों में देवी को ही प्राणतोषिनी कहा गया है। देवी की स्तुति से देवी की अमोघ कृपा प्राप्त होती है।

माँ का स्तुति मंत्र
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छिन्न्मस्ता करे वामे धार्यन्तीं स्व्मास्ताकम,

प्रसारितमुखिम भीमां लेलिहानाग्रजिव्हिकाम,

पिवंतीं रौधिरीं धारां निजकंठविनिर्गाताम,

विकीर्णकेशपाशान्श्च नाना पुष्प समन्विताम,

दक्षिणे च करे कर्त्री मुण्डमालाविभूषिताम,

दिगम्बरीं महाघोरां प्रत्यालीढ़पदे स्थिताम,

अस्थिमालाधरां देवीं नागयज्ञो पवीतिनिम,

डाकिनीवर्णिनीयुक्तां वामदक्षिणयोगत:।

गृहस्थ साधक को सदा ही देवी की सौम्य रूप में साधना पूजा करनी चाहिए। देवी योगमयी हैं ध्यान समाधी द्वारा भी इनको प्रसन्न किया जा सकता है। इडा पिंगला सहित स्वयं देवी सुषुम्ना नाड़ी हैं जो कुण्डलिनी का स्थान हैं। देवी के भक्त को मृत्यु भय नहीं रहता वो इच्छानुसार जन्म ले सकता है। देवी की मूर्ती पर रुद्राक्षनाग केसर व रक्त चन्दन चढाने से बड़ी से बड़ी बाधा भी नष्ट होती है

महाविद्या छिन्मस्ता के इन मन्त्रों से आधी व्यादी सहित बड़े से बड़े दुखों का नाश संभव है।

देवी माँ का स्वत: सिद्ध महामंत्र
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ॐ श्रीं ह्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्र वैरोचिनिये ह्रीं ह्रीं फट स्वाहा।

इस मंत्र से काम्य प्रयोग भी संपन्न किये जाते हैं व देवी को पुष्प अत्यंत प्रिय हैं इसलिए केवल पुष्पों के होम से ही देवी कृपा कर देती है,आप भी मनोकामना के लिए यज्ञ कर सकते हैं,जैसे-

१. मालती के फूलों से होम करने पर बाक सिद्धि होती है व चंपा के फूलों से होम करने पर सुखों में बढ़ोतरी होती है

२. बेलपत्र के फूलों से होम करने पर लक्ष्मी प्राप्त होती है व बेल के फलों से हवन करने पर अभीष्ट सिद्धि होती है

३. सफेद कनेर के फूलों से होम करने पर रोगमुक्ति मिलती है तथा अल्पायु दोष नष्ट हो 100 साल आयु होती है

४. लाल कनेर के पुष्पों से होम करने पर बहुत से लोगों का आकर्षण होता है व बंधूक पुष्पों से होम करने पर भाग्य बृद्धि होती है

५. कमल के पुष्पों का गी के साथ होम करने से बड़ी से बड़ी बाधा भी रुक जाती है

६ .मल्लिका नाम के फूलों के होम से भीड़ को भी बश में किया जा सकता है व अशोक के पुष्पों से होम करने पर पुत्र प्राप्ति होती है

७ .महुए के पुष्पों से होम करने पर सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं व देवी प्रसन्न होती है

महाअंक-देवी द्वारा उतपन्न गणित का अंक जिसे स्वयं छिन्नमस्ता ही कहा जाता है वो देवी का महाअंक है -“४”

विशेष पूजा सामग्रियां
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मालती के फूल, सफेद कनेर के फूल, पीले पुष्प व पुष्पमालाएं चढ़ाएं केसर, पीले रंग से रंगे हुए अक्षत, देसी घी, सफेद तिल, धतूरा, जौ, सुपारी व पान चढ़ाएं, बादाम व सूखे फल प्रसाद रूप में अर्पित करें, सीपियाँ पूजन स्थान पर रखें, भोजपत्र पर ॐ ह्रीं ॐ लिख करा अर्पण करें, दूर्वा,गंगाजल, शहद, कपूर, रक्त चन्दन चढ़ाएं, संभव हो तो चंडी या ताम्बे के पात्रों का ही पूजन में प्रयोग करें।

देवी छिन्नमस्ता की विभिन्न प्रकार से पूजा करें। सरसों के तेल में नील मिलाकर दीपक करें। हो सके तो देवी पर नीले फूल (मन्दाकिनी अथवा सदाबहार) चढ़ाएं। देवी पर सुरमे से तिलक करें। लोहबान से धूप करें और इत्र अर्पित करें। उड़द से बने मिष्ठान का भोग लगाएं। तत्पश्चात बाएं हाथ में काले नमक की डली लेकर दाएं हाथ से काले हकीक अथवा अष्टमुखी रुद्राक्ष माला अथवा लाजवर्त की माला से देवी के इस अदभूत मंत्र का यथासंभव जाप करें।
मंत्र: श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्र वैरोचनीयै हूं हूं फट स्वाहा: ।।
जाप पूरा होने के बाद काले नमक की डली को बरगद के नीचे गाड़ दें। बची हुई सामग्री को जल प्रवाह कर दें। इस साधना से शत्रुओं का तुरंत नाश होता है, रोजगार में सफलता मिलती है, नौकरी में प्रमोशन मिलती है तथा कोर्ट कचहरी वाद-विवाद व मुकदमों में निश्चित सफलता मिलती है। महाविद्या छिन्नमस्ता की साधना से जीवन की सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं।

साधना विधान
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इस साधना को छिन्नमस्ता जयन्ती अथवा किसी भी मंगलवार से आरम्भ किया जा सकता है। आप चाहे तो इस साधना को नवरात्रि के प्रथम दिन से भी शुरु कर सकते हैं। यह साधना रात्रि काल में ही सम्पन्न की जाती है, अतः मन्त्र जाप रात्रि में ही किया जाए अर्थात यह साधना रात्रि को दस बजे आरम्भ करके प्रातः लगभग तीन या चार बजे तक समाप्त करनी चाहिए।

इस साधना को पूरा करने के लिए सवा लाख मन्त्र जाप सम्पन्न करना चाहिए और यह साधना ग्यारह या इक्कीस दिनों में पूरी होनी चाहिए।

रात्रि को लगभग दस बजे स्नान करके काली अथवा नीली धोती धारण कर लें। फिर साधना कक्ष में जाकर दक्षिण दिशा की ओर मुँह करके काले या नीले ऊनी आसन पर बैठ जाएं। अपने सामने किसी बाजोट पर काला अथवा नीला वस्त्र बिछाकर उस पर सद्गुरुदेवजी का चित्र या विग्रह और माँ भगवती छिन्नमस्ता का यन्त्र-चित्र स्थापित कर लें। इसके साथ ही गणपति और भैरव के प्रतीक रूप में दो सुपारी क्रमशः अक्षत एवं काले तिल की ढेरी पर स्थापित कर दें।
अब सबसे पहले साधक शुद्ध घी का दीपक प्रज्ज्वलित कर धूप-अगरबत्ती भी लगा दे। फिर सामान्य गुरुपूजन सम्पन्न करें तथा गुरुमन्त्र की कम से कम चार माला जाप करें। फिर सद्गुरुदेवजी से छिन्नमस्ता साधना सम्पन्न करने की अनुमति लें और उनसे साधना की निर्बाध पूर्णता और सफलता के लिए प्रार्थना करें।

इसके बाद साधक संक्षिप्त गणपति पूजन सम्पन्न करें और “ॐ वक्रतुण्डाय हुम्” मन्त्र का एक माला जाप करें। फिर भगवान गणपतिजी से साधना की निर्विघ्न पूर्णता और सफलता के लिए प्रार्थना करें।

तत्पश्चात साधक सामान्य भैरवपूजन सम्पन्न करें और“ॐ हूं क्रोधभैरवाय हूं फट्” मन्त्र का एक माला जाप करें। फिर भगवान क्रोध भैरवजी से साधना की निर्बाध पूर्णता और सफलता के लिए प्रार्थना करें।

इसके बाद साधना के पहले दिन साधक को संकल्प अवश्य लेना चाहिए। इसके लिए दाहिने हाथ में जल लेकर संकल्प लें कि “मैं अमुक नाम का साधक अमुक गौत्र का आज से श्री छिन्नमस्ता साधना का अनुष्ठान प्रारम्भ कर रहा हूँ। मैं नित्य २१ दिनों तक ६० माला मन्त्र जाप करूँगा। हे, माँ! आप मेरी साधना को स्वीकार कर मुझे इस मन्त्र की सिद्धि प्रदान करें और इसकी ऊर्जा को आप मेरे भीतर स्थापित कर दें।” ऐसा कह कर हाथ में लिया हुआ जल जमीन पर छोड़ देना चाहिए। इसके बाद प्रतिदिन संकल्प लेने की आवश्यकता नहीं है।
तदुपरान्त साधक माँ भगवती छिन्नमस्ता चित्र और यन्त्र का सामान्य पूजन करे। उस पर कुमकुम, अक्षत और पुष्प चढ़ावें। किसी मिष्ठान्न का भोग लगाएं। उसके सामने दीपक और लोबान धूप जला लें,फिर साधक दाहिने हाथ में जल लेकर निम्न विनियोग मन्त्र पढ़ें ---

विनियोग
〰️〰️〰️ॐ अस्य श्री शिरच्छिन्नामन्त्रस्य भैरव ऋषिः सम्राट् छन्दः श्री छिन्नमस्ता देवता ह्रींकारद्वयं बीजं स्वाहा शक्तिः मम् अभीष्ट कार्य सिध्यर्थे जपे विनियोगः ऋष्यादिन्यास :
ॐ भैरव ऋषयै नमः शिरसि। (सिर को स्पर्श करें)
ॐ सम्राट् छन्दसे नमः मुखे।      (मुख को स्पर्श करें)  
ॐश्री छिन्नमस्ता देवतायै नमः हृदये(हृदय को स्पर्श करें)
ॐ ह्रीं ह्रीं बीजाय नमो गुह्ये।   (गुह्य स्थान को स्पर्श करें)
ॐ स्वाहा शक्तये नमः पादयोः।        (पैरों को स्पर्श करें)
ॐ ममाभीष्ट कार्य सिद्धयर्थये जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे।  (सभी अंगों को स्पर्श करें)

करन्यास
〰️〰️〰️ॐ आं खड्गाय स्वाहा अँगुष्ठयोः।   (दोनों तर्जनी उंगलियों से दोनों अँगूठे को स्पर्श करें)
ॐ ईं सुखदगाय स्वाहा तर्जन्योः।    (दोनों अँगूठों से दोनों तर्जनी उंगलियों को स्पर्श करें)
ॐ ऊं वज्राय स्वाहा मध्यमयोः।     (दोनों अँगूठों से दोनों मध्यमा उंगलियों को स्पर्श करें)
ॐ ऐं पाशाय स्वाहा अनामिकयोः।   (दोनों अँगूठों से दोनों अनामिका उंगलियों को स्पर्श करें)
ॐ औं अंकुशाय स्वाहा कनिष्ठयोः।  (दोनों अँगूठों से दोनों कनिष्ठिका उंगलियों को स्पर्श करें)
ॐ अ: सुरक्ष रक्ष ह्रीं ह्रीं स्वाहा करतलकर पृष्ठयोः। (परस्पर दोनों हाथों को स्पर्श करें)

हृदयादिन्यास 
〰️〰️〰️〰️ॐ आं खड्गाय हृदयाय नमः स्वाह,(हृदय को स्पर्श करें)
ॐ ईं सुखदगाय शिरसे स्वाहा स्वाहा। (सिर को स्पर्श करें)
ॐ ऊं वज्राय शिखायै वषट् स्वाहा। (शिखा को स्पर्श करें)
ॐ ऐं पाशाय कवचाय हूं स्वाहा। (भुजाओं को स्पर्श करें)
ॐ औं अंकुशाय नेत्रत्रयाय वौषट् स्वाहा(नेत्रों को स्पर्श करें)ॐ अ: सुरक्ष रक्ष ह्रीं ह्रीं अस्त्राय फट् स्वाहा। (सिर से घूमाकर तीन बार ताली बजाएं)

व्यापक न्यास 
〰️〰️〰️〰️ॐ श्रीं ह्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्रवेरोचनियै ह्रींह्रीं फट् स्वाहा मस्तकादि पादपर्यन्तम्।
ॐ श्रीं ह्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्रवेरोचनियै ह्रीं ह्रीं फट् स्वाहा पादादि मस्तकान्तम्। इससे तीन बार न्यास करें।
इसके बाद साधक हाथ जोड़कर निम्न ध्यान मन्त्र से भगवती छिन्नमस्ता का ध्यान करें ---

ध्यान 
〰️〰️ॐ भास्वन्मण्डलमध्यगां निजशिरश्छिन्नं विकीर्णालकम्
 स्फारास्यं प्रपिबद्गलात् स्वरुधिरं वामे करे बिभ्रतीम्।
याभासक्तरतिस्मरोपरिगतां सख्यौ निजे डाकिनी
वर्णिन्यौ परिदृश्य मोदकलितां श्रीछिन्नमस्तां भजे।।
इसके बाद साधक भगवती छिन्नमस्ता के मूलमन्त्र कारद्राक्ष माला से ६० माला जाप करें ---मन्त्र
 ॐ श्रीं ह्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्र वैरोचनीयै ह्रीं ह्रीं फट् स्वाहा

मन्त्र जाप के उपरान्त साधक निम्न सन्दर्भ का उच्चारण करने के बाद एक आचमनी जल छोड़कर सम्पूर्ण जाप भगवती छिन्नमस्ता को समर्पित कर दें।
ॐ गुह्यातिगुह्य गोप्त्री त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपं।
    सिद्धिर्भवतु मे देवि! त्वत्प्रसादान्महेश्वर,
 इस प्रकार यह साधना क्रम साधक नित्य २१ दिनों तक निरन्तर सम्पन्न करें। जब पूरे सवा लाख मन्त्र जाप हो जाएं,  तब पलाश के पुष्प अथवा बिल्व के पुष्पों से दशांश हवन करें। ऐसा करने पर यह साधना सिद्ध हो जाती है।

साधना नियम 
〰️〰️〰️〰️१. ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करें।
२. एक समय फलाहार लें,  अन्न लेना वर्जित है।
३. मन्त्र जाप समाप्ति के बाद उसी स्थान पर सो जाएं।
४. साधना काल में साधक अन्य कोई  कार्य, नौकरी, व्यापार आदि न करे।

छिन्नमस्ता साधना सौम्य साधना है और आज के भौतिक युग में इस साधना की नितान्त आवश्यकता है। इस साधना के द्वारा साधक जहाँ पूर्ण भौतिक सुख प्राप्त कर सकता है, वहीं वह आध्यात्मिक क्षेत्र में भी पूर्णता प्राप्त करने में समर्थ होता है। साधक कई साधनाओं में स्वतः सफलता प्राप्त कर लेता है और इस साधना के द्वारा कई-कई जन्मों के पाप कटकर वह निर्मल हो जाता है। यह साधना अत्यधिक सरल, उपयोगी और आश्चर्यजनक सफलता देने में समर्थ है। आपकी साधना सफल हो और माँ भगवती छिन्नमस्ता का आपको आशीष प्राप्त हो। मैं सद्गुरुदेव भगवानजी से ऐसी ही प्रार्थना करता हूँ 

छिन्नमस्ता कवच
〰️〰️〰️〰️〰️साधकों को मां छिन्नमस्ता का जप करने से पहले कवच का पाठ अवश्य करना चाहिए। यह एक बहुत ही उच्चकोटि की एवं उग्र साधना है, इसलिए सर्वप्रथम किसी योग्य गुरू से दीक्षा अवश्य ग्रहण करें। किताबों से पढकर यह साधना करने का प्रयास कदापि न करें। जो साधक कुण्डलिनी जागरण में रूचि रखते हैं उन्हें छिन्नमस्ता साधना अवश्य करनी चाहिए। मां छिन्नमस्ता की साधना से योग की सिद्धि भी सरलता से मिल जाती है। बड़ी से बड़ी समस्या का समाधान इस साधना से सम्भव है। मां छिन्नमस्ता आप पर कृपा करें।

श्रीगणेशाय नमः।
देव्युवाच।
कथिताश्छिन्नमस्ताया या या विद्याः सुगोपिताः।
त्वया नाथेन जीवेश श्रुताश्चाधिगता मया॥ १॥
इदानीं श्रोतुमिच्छामि कवचं सर्वसूचितम्।
त्रैलोक्यविजयं नाम कृपया कथ्यतां प्रभो॥ 
              भैरव उवाच।
श्रुणु वक्ष्यामि देवेशि सर्वदेवनमस्कृते।
त्रैलोक्यविजयं नाम कवचं सर्वमोहनम्॥ ३॥
सर्वविद्यामयं साक्षात्सुरासुर जयप्रदम्।
धारणात्पठनादीशस्त्रैलोक्यविजयी विभुः॥ ४॥
ब्रह्मा नारायणो रुद्रो धारणात्पठनाद्यतः।
कर्ता पाता च संहर्ता भुवनानां सुरेश्वरि॥ ५॥
न देयं परशिष्येभ्योऽभक्तेभ्योऽपि विशेषतः।
देयं शिष्याय भक्ताय प्राणेभ्योऽप्यधिकाय च॥ ६॥
देव्याश्च च्छिन्नमस्तायाः कवचस्य च भैरवः।
ऋषिस्तु स्याद्विराट् छन्दो देवता च्छिन्नमस्तका॥ ७॥
त्रैलोक्यविजये मुक्तौ विनियोगः प्रकीर्तितः।
हुंकारो मे शिरः पातु छिन्नमस्ता बलप्रदा॥ ८॥
ह्रां ह्रूं ऐं त्र्यक्षरी पातु भालं वक्त्रं दिगम्बरा।
श्रीं ह्रीं ह्रूं ऐं दृशौ पातु मुण्डं कर्त्रिधरापि सा॥ ९॥
सा विद्या प्रणवाद्यन्ता श्रुतियुग्मं सदाऽवतु।
वज्रवैरोचनीये हुं फट् स्वाहा च ध्रुवादिका॥ १०॥
घ्राणं पातु च्छिन्नमस्ता मुण्डकर्त्रिविधारिणी।
श्रीमायाकूर्चवाग्बीजै र्वज्रवैरोचनीय हूं॥ ११॥
हूं फट् स्वाहा महाविद्या षोडशी ब्रह्मरूपिणी।
स्वपार्श्वे वर्णिनी चासृग्धारां पाययती मुदा॥ १२॥
वदनं सर्वदा पातु च्छिन्नमस्ता स्वशक्तिका।
मुण्डकर्त्रिधरा रक्ता साधकाभीष्टदायिनी॥ १३॥
वर्णिनी डाकिनीयुक्ता सापि मामभितोऽवतु।
रामाद्या पातु जिह्वां च लज्जाद्या पातु कण्ठकम्॥ १४॥
कूर्चाद्या हृदयं पातु वागाद्या स्तनयुग्मकम्।
रमया पुटिता विद्या पार्श्वौ पातु सुरेश्र्वरी॥ १५॥
मायया पुटिता पातु नाभिदेशे दिगम्बरा।
कूर्चेण पुटिता देवी पृष्ठदेशे सदाऽवतु॥ १६॥
वाग्बीजपुटिता चैषा मध्यं पातु सशक्तिका।
ईश्वरी कूर्चवाग्बीजै र्वज्रवैरोचनीय हूं॥ १७॥
हूं फट् स्वाहा महाविद्या कोटिसूर्य्यसमप्रभा।
छिन्नमस्ता सदा पायादुरुयुग्मं सशक्तिका॥ १८॥
ह्रीं ह्रूं वर्णिनी जानुं श्रीं ह्रीं च डाकिनी पदम्।
सर्वविद्यास्थिता नित्या सर्वाङ्गं मे सदाऽवतु॥ १९॥
प्राच्यां पायादेकलिङ्गा योगिनी पावकेऽवतु।
डाकिनी दक्षिणे पातु श्रीमहाभैरवी च माम्॥ २०॥
नैरृत्यां सततं पातु भैरवी पश्चिमेऽवतु।
इन्द्राक्षी पातु वायव्येऽसिताङ्गी पातु चोत्तरे॥ २१॥
संहारिणी सदा पातु शिवकोणे सकर्त्रिका।
इत्यष्टशक्तयः पान्तु दिग्विदिक्षु सकर्त्रिकाः॥ २२॥
क्रीं क्रीं क्रीं पातु सा पूर्वं ह्रीं ह्रीं मां पातु पावके।
ह्रूं ह्रूं मां दक्षिणे पातु दक्षिणे कालिकाऽवतु॥ २३॥
क्रीं क्रीं क्रीं चैव नैरृत्यां ह्रीं ह्रीं च पश्चिमेऽवतु।
हूं हूं पातु मरुत्कोणे स्वाहा पातु सदोत्तरे॥ २४॥
महाकाली खड्गहस्ता रक्षःकोणे सदाऽवतु।
तारो माया वधूः कूर्चं फट्कारोऽयं महामनुः॥ २५॥
खड्गकर्त्रिधरा तारा चोर्ध्वदेशं सदाऽवतु।
ह्रीं स्त्रीं हूं फट् च पाताले मां पातु चैकजटा सती।
तारा तु सहिता खेऽव्यान्महानीलसरस्वती॥ २६॥
इति ते कथितं देव्याः कवचं मन्त्रविग्रहम्।
यद् धृत्वा पठनाद्भीमः क्रोधाख्यो भैरवः स्मृतः॥ २७॥
सुरासुर मुनीन्द्राणां कर्ता हर्ता भवेत्स्वयम्।
यस्याज्ञया मधुमती याति सा साधकालयम्॥ २८॥
भूतिन्याद्याश्च डाकिन्यो यक्षिण्याद्याश्च खेचराः।
आज्ञां गृह्णंति तास्तस्य कवचस्य प्रसादतः॥ २९॥
एतदेव परं ब्रह्मकवचं मन्मुखोदितम्।
देवीमभ्यर्च्य गन्धाद्यैर्मूलेनैव पठेत्सकृत्॥ ३०॥
संवत्सरकृतायास्तु पूजायाः फलमाप्नुयात्।
भूर्जे विलिखितं चैतद् गुटिकां काञ्चनस्थिताम्॥ ३१॥
धारयेद्दक्षिणे बाहौ कण्ठे वा यदि वान्यतः।
सर्वैश्वर्ययुतो भूत्वा त्रैलोक्यं वशमानयेत्॥ ३२॥
तस्य गेहे वसेल्लक्ष्मीर्वाणी च वदनाम्बुजे।
ब्रह्मास्त्रादीनि शस्त्राणि तद्गात्रे यान्ति सौम्यताम्॥ ३३॥
इदं कवचमज्ञात्वा यो भजेच्छिन्नमस्तकाम्।
सोऽपि शस्त्रप्रहारेण मृत्युमाप्नोति सत्वरम्॥ ३४॥
॥ इति श्रीभैरवतन्त्रे भैरवभैरवीसंवादे
त्रैलोक्यविजयं नाम छिन्नमस्ताकवचं।

पूजा के बाद खेचरी मुद्रा लगा कर ध्यान का अभ्यास करना चाहिए सभी चढ़ावे चढाते हुये देवी का ये मंत्र पढ़ें-

ॐ वीररात्रि स्वरूपिन्ये नम:

देवी के दो प्रमुख रूपों के दो महामंत्र

१)देवी प्रचंड चंडिका मंत्र-ऐं श्रीं क्लीं ह्रीं ऐं वज्र वैरोचिनिये ह्रीं ह्रीं फट स्वाहा

२)देवी रेणुका शबरी मंत्र-ॐ श्रीं ह्रीं क्रौं ऐं

सभी मन्त्रों के जाप से पहले कबंध शिव का नाम लेना चाहिए तथा उनका ध्यान करना चाहिए

सबसे महत्त्वपूर्ण देवी का महायंत्र होता है।जिसके बिना साधना कभी पूर्ण नहीं होती इसलिए देवी के यन्त्र को जरूर स्थापित करे व पूजन करें।

यन्त्र के पूजन की विधि 
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पंचोपचार पूजन करें-धूप,दीप,फल,पुष्प,जल आदि चढ़ाएं।

ॐ कबंध शिवाय नम: मम यंत्रोद्दारय-द्दारय

कहते हुये पानी के 21 बार छीटे दें व पुष्प धूप अर्पित करें

देवी को प्रसन्न करने के लिए सह्त्रनाम त्रिलोक्य कवच आदि का पाठ शुभ माना गया है

यदि आप विधिवत पूजा पाठ नहीं कर सकते तो मूल मंत्र के साथ साथ नामावली का गायन करें

छिन्नमस्ता शतनाम का गायन करने से भी देवी की कृपा आप प्राप्त कर सकते हैं

छिन्नमस्ता शतनामावली
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प्रचंडचंडिका चड़ा चंडदैत्यविनाशिनी,

चामुंडा च सुचंडा च चपला चारुदेहिनी,

ल्लजिह्वा चलदरक्ता चारुचन्द्रनिभानना,

चकोराक्षी चंडनादा चंचला च मनोन्मदा,

देवी के कुछ इच्छा पूरक मंत्र
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1) देवी छिन्नमस्ता का शत्रु नाशक मंत्र

ॐ श्रीं ह्रीं ह्रीं वज्र वैरोचिनिये फट

लाल रंग के वस्त्र और पुष्प देवी को अर्पित करें, नवैद्य प्रसाद,पुष्प,धूप दीप आरती आदि से पूजन करें, रुद्राक्ष की माला से 6 माला का मंत्र जप करें, देवी मंदिर में बैठ कर मंत्र जाप से शीघ्र फल मिलता है, काले रग का वस्त्र आसन के रूप में रखें या उनी कम्बल का आसन रखें, दक्षिण दिशा की ओर मुख रखें
, अखरोट व अन्य फल प्रसाद रूप में चढ़ाएं

2) देवी छिन्नमस्ता का धन प्रदाता मंत्र

ऐं श्रीं क्लीं ह्रीं वज्रवैरोचिनिये फट

गुड, नारियल, केसर, कपूर व पान देवी को अर्पित करें, शहद से हवन करें, रुद्राक्ष की माला से 7 माला का मंत्र जप करें।

3) देवी छिन्नमस्ता का प्रेम प्रदाता मंत्र

ॐ आं ह्रीं श्रीं वज्रवैरोचिनिये हुम

देवी पूजा का कलश स्थापित करें, देवी को सिन्दूर व लोंग इलायची समर्पित करें, रुद्राक्ष की माला से 6 माला का मंत्र जप करें, किसी नदी के किनारे बैठ कर मंत्र जाप से शीघ्र फल मिलता है, भगवे रग का वस्त्र आसन के रूप में रखें या उनी कम्बल का आसन रखें, उत्तर दिशा की ओर मुख रखें, खीर प्रसाद रूप में चढ़ाएं

4) देवी छिन्नमस्ता का सौभाग्य वर्धक मंत्र

ॐ श्रीं श्रीं ऐं वज्रवैरोचिनिये स्वाहा

देवी को मीठा पान व फलों का प्रसाद अर्पित करना चाहिए, रुद्राक्ष की माला से 5 माला का मंत्र जप करें, किसी वृक्ष के नीचे बैठ कर मंत्र जाप से शीघ्र फल मिलता है, संतरी रग का वस्त्र आसन के रूप में रखें या उनी कम्बल का आसन रखें, पूर्व दिशा की ओर मुख रखें, पेठा प्रसाद रूप में चढ़ाएं

5) देवी छिन्नमस्ता का ग्रहदोष नाशक मंत्र

ॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं वं वज्रवैरोचिनिये हुम

देवी को पंचामृत व पुष्प अर्पित करें, रुद्राक्ष की माला से 4 माला का मंत्र जप करें, मंदिर के गुम्बद के नीचे या प्राण प्रतिष्ठित मूर्ती के निकट बैठ कर मंत्र जाप से शीघ्र फल मिलता है। पीले रग का वस्त्र आसन के रूप में रखें या उनी कम्बल का आसन रखें, उत्तर दिशा की ओर मुख रखें, नारियल व तरबूज प्रसाद रूप में चढ़ाएं, 

देवी की पूजा में सावधानियां व निषेध कार्य
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बिना “कबंध शिव” की पूजा के महाविद्या छिन्नमस्ता की साधना न करें, सन्यासियों व साधू संतों की निंदा बिलकुल न करें, साधना के दौरान अपने भोजन आदि में हींग व काली मिर्च का प्रयोग न करें, देवी भक्त ध्यान व योग के समय भूमि पर बिना आसन कदापि न बैठें, सरसों के तेल का दीया न जलाएं

विशेष गुरु दीक्षा
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महाविद्या छिन्नमस्ता की अनुकम्पा पाने के लिए अपने गुरु से आप दीक्षा जरूर लें आप  निम्न में से कोई भी एक दीक्षा ले सकते हैं।

छिन्नमस्ता दीक्षा, वज्र वैरोचिनी दीक्षा, रेणुका शबरी दीक्षा, वज्र दीक्षा, पञ्च नाडी दीक्षा, सिद्ध खेचरी दीक्षा, छिन्न्शिर: दीक्षा, त्रिकाल दीक्षा, कालज्ञान दीक्षा, कुण्डलिनी दीक्षा आदि।

शुभम भवतु
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सोमवार, 15 फ़रवरी 2021

करोड़ो के बजट की धाकड़ फ़िल्म के निर्माता ने नहीं दिया भुगतान, सुरक्षा विभाग ने शूटिंग टीम को रोका अधिकारियों के निर्देश ओर कल तक के आश्वासन पर आधे घण्टे बाद शुरू हो सकी शूटिंग



बैतूल- सारणी के सतपुड़ा ताप विद्युत गृह के कोल हैंडलिंग प्लांट में की जा रही फिल्म धाकड़ की शूटिंग का किराया नहीं दिया गया है। इसे लेकर सोमवार को शाम जब फिल्म की यूनिट शूटिंग करने के लिए पहुंची तो सुरक्षा विभाग ने कोल हैंडलिंग प्लांट के बाहर ही रोक दिया। कोल हैंडलिंग प्लांट के प्रभारी एसएन सिंह ने बताया कि भुगतान को लेकर शूटिंग यूनिट को रोक दिया गया था। इसके बाद उच्चाधिकारियों के निर्देश पर आधा घंटे बाद शूटिंग करने के लिए अनुमति देकर प्रवेश दिया गया। उन्होंने बताया कि मंगलवार को भुगतान करने का भरोसा दिलाया गया हैं, इस कारण शूटिंग की इजाजत दे दी गई है।अभिनेत्री कंगना रणावत कोल हैंडलिंग प्लांट में बनाए गए सेट पर शूटिंग कर रही हैं।

इसके लिए सतपुड़ा ताप विद्युत गृह सारणी के आधिपत्य वाले कोल हैंडलिंग प्लांट, अपर रेस्ट हाउस एवं अन्य स्थानों का उपयोग किया जा रहा है। शूटिंग के लिए 25 जनवरी से इन सभी स्थानों का किराया वसूल किया जाना है। हालांकि कोल हैंडलिंग प्लांट के प्रभारी कितनी राशि बाकी है, इस संबंध में कोई भी जानकारी देने से इंकार कर रहे हैं। उन्होंने इतना जरूर बताया कि भुगतान न किए जाने के कारण शूटिंग करने के लिए प्रवेश नहीं दिया गया था। बाद में मंगलवार को भुगतान करने का आश्वासन दिया गया, जिसके बाद सभी को प्रवेश देकर दिया गया और शूटिंग प्रारंभ हो गई है।

जनजातीय सुरक्षा मंच ने मोर्चा खोला, धर्मांतरित जनजातियों का आरक्षण खत्म किया जाए



खंडवा - धर्मांतरित जनजातियों को अनुसूचित जनजाति सूची से हटाकर उन्हें दिया जाने वाला आरक्षण खत्म करने की मांग को लेकर सोमवार को जनजाति सुरक्षा मंच ने राष्ट्रपति के व प्रधानमंत्री के नाम कलेक्टर व जिले की चार विधानसभाओं के विधायकों व जिला पंचायत अध्यक्ष को  ज्ञापन सौंपें गए। खंडवा में पंधाना विधायक राम दांगोरे और विधायक देवेन्द्र वर्मा को सौंप ज्ञापन में बताया कि धर्मान्तरित जनजातियों को आरक्षण सुविधाएं दिए जाने के खिलाफ तत्कालीन बिहार सरकार के जनजातीय नेता और लोकसभा सदस्य व केंद्रीय मंत्री कार्तिक उराव ने तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी को 1970 में आवेदन दिया था। इस बात को 50 साल हो गए हैं। उस आवेदन को न तो लोकसभा में पटल पर रखा गया था, ना ही उसे खारिज किया था बल्कि उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया था। भारतीय अधिनियम 1935 के तहत भारतीय ईसाई की परिभाषा में यह कहा गया है, कि भारतीय ईसाई वह होगा जो कोई भी ईसाई पंथ को मानता हो। इसके अनुसार अनुसूचित जनजाति से जब एक व्यक्ति ईसाई धर्म में धर्मान्तरित हो जाता है, तो स्वाभाविक रूप से वह व्यक्ति भारतीय ईसाई की श्रेणी में आएगा। इसलिए उसको किसी भी प्रकार की आरक्षण की सुविधाएं देना असंवैधानिक माना जाएगा। ज्ञापन में बताया, कि अनुसूचित जनजातियों के साथ हो रहे इस अन्याय को हमेशा के लिए खत्म कर धर्मांतरित लोगों को अनुसूचित जनजाति की सूची से हटाने के लिए आवश्यक संसोधन किया जाए। ज्ञापन देने वालों में जनजाति सुरक्षा मंच के संगठन मंत्री ब्रजलाल ठाकरे, जिलाध्यक्ष रामजीवन गंधवाने, चिंताराम जगताप, रामसिंह रावत सहित मंच के पदाधिकारी मौजूद थे।

रविवार, 14 फ़रवरी 2021

1 अप्रैल से पटरी पर दौड़ेंगी सभी ट्रेनें! रेलवे का प्लान तैयार, होली में बढ़ती डिमांड को देखते हुए मिल सकती है हरी झंडी



Indian Railways: रेलव यात्रियों के लिए बड़ी खुशखबरी है. 1 अप्रैल से सभी ट्रेनें पटरी पर दौड़ने लगेंगी, ज़ी न्यूज को मिली एक्सक्लूसिव जानकारी के मुताबिक भारतीय रेलवे 1 अप्रैल 2021 से सभी ट्रेनों को परिचालन शुरू कर सकता है.

नई दिल्ली: रेलव यात्रियों के लिए बड़ी खुशखबरी है. 1 अप्रैल से सभी ट्रेनें पटरी पर दौड़ने लगेंगी, ज़ी न्यूज को मिली एक्सक्लूसिव जानकारी के मुताबिक भारतीय रेलवे 1 अप्रैल 2021 से सभी ट्रेनों को परिचालन शुरू कर सकता है. इसके लिए रेलवे ने तैयारी भी पूरी कर ली है.  



1 अप्रैल से पटरी पर दौड़ेंगी सभी ट्रेनें?

दरअसल, 29 मार्च को होली का त्योहार पड़ रहा है, जिसमें ट्रेनों की भारी डिमांड होती है. इसलिए यात्रियों को ट्रेनों के लिए मारामारी न करनी पड़े. रेलवे 1 अप्रैल से सभी ट्रेनों को पटरी पर उतार सकता है. इसमें जनरल, शताब्दी और राजधानी सभी तरह की ट्रेनें चलाई जाएंगी. सूत्रों का ये भी कहना है कि कोरोना की स्थिति को नियंत्रण में देखते हुए रेलवे सभी ट्रेनों को चलाने की इजाजत दे सकता है।


अभी 65 परसेंट ट्रेनें ही चल रहीं

अभी कोरोना महामारी को देखते हुए रेलवे 65 परसेंट पैसेंजर ट्रेनों को ही चला रहा है. इसमें मेल और एक्सप्रेस दोनों तरह की ट्रेनें शामिल हैं. रेलवे के इस कदम से लगभग सभी सब-अर्बन या मेट्रो ट्रेनें भी पटरी पर लौट आईं हैं. मुंबई में शुक्रवार यानी 29 जनवरी से 95 परसेंट लोकल ट्रेनों की सेवाएं बहाल हो गई हैं. हालांकि ट्रेनों की संख्या तो बढ़ रही है लेकिन आम लोगों को इसमें सफर के लिए थोड़ा और इंतज़ार करना पड़ सकता है. 

फिलहाल मुंबई में वेस्टर्न रेलवे रूट पर 704 लोकल ट्रेनें चल रही है जिनमें 3.95 लाख मुसाफिर सफर कर रहे है. वहीं सेंट्रल रेलवे रूट पर 706 लोकल ट्रेंने चलाई जा रही है जिनमे करीब 4.57 लाख लोग सफर कर रहे है. 


अभी सिर्फ कोविड स्पेशल ट्रेनें चल रही हैं-

कोरोना की वजह से भारतीय रेल ने ट्रेनों का संचालन रोक दिया था, अब धीरे धीरे ट्रेनों को एक फिर पटरी पर लाने की कोशिश की जा रही है. अभी केवल कोव‍िड स्‍पेशल ट्रेनें ही चल रही हैं. अभी माना जा रहा है क‍ि मार्च में होली जैसा बड़ा त्योहार पड़ेगा. ऐसे में यात्र‍ियों की संख्‍या बढ़ेगी और ट्रेनों की डिमांड भी. 

अभी जो ट्रेनें चल रही हैं वो कोव‍िड स्‍पेशल ट्रेनें हैं, जिनका किराया भी ज्यादा है. अगर सबकुछ सही रहा और तैयारियां हो गईं तो एक्‍सप्रेस, मेमू, डेमू और अन्‍य लोकल पैसेंजर ट्रेनों का परि‍चालन जल्‍द ही शुरू क‍िया जा सकता है. लोग त्योहार में अपने घर ट्रेनों में जा सकेंगे और किराया भी कम देना पड़ेगा


1 अप्रैल से पटरी पर दौड़ेंगी सभी ट्रेनें! रेलवे का प्लान तैयार, होली में बढ़ती डिमांड को देखते हुए मिल सकती है हरी झंडी



Indian Railways: रेलव यात्रियों के लिए बड़ी खुशखबरी है. 1 अप्रैल से सभी ट्रेनें पटरी पर दौड़ने लगेंगी, ज़ी न्यूज को मिली एक्सक्लूसिव जानकारी के मुताबिक भारतीय रेलवे 1 अप्रैल 2021 से सभी ट्रेनों को परिचालन शुरू कर सकता है.

नई दिल्ली: रेलव यात्रियों के लिए बड़ी खुशखबरी है. 1 अप्रैल से सभी ट्रेनें पटरी पर दौड़ने लगेंगी, ज़ी न्यूज को मिली एक्सक्लूसिव जानकारी के मुताबिक भारतीय रेलवे 1 अप्रैल 2021 से सभी ट्रेनों को परिचालन शुरू कर सकता है. इसके लिए रेलवे ने तैयारी भी पूरी कर ली है.  



1 अप्रैल से पटरी पर दौड़ेंगी सभी ट्रेनें?

दरअसल, 29 मार्च को होली का त्योहार पड़ रहा है, जिसमें ट्रेनों की भारी डिमांड होती है. इसलिए यात्रियों को ट्रेनों के लिए मारामारी न करनी पड़े. रेलवे 1 अप्रैल से सभी ट्रेनों को पटरी पर उतार सकता है. इसमें जनरल, शताब्दी और राजधानी सभी तरह की ट्रेनें चलाई जाएंगी. सूत्रों का ये भी कहना है कि कोरोना की स्थिति को नियंत्रण में देखते हुए रेलवे सभी ट्रेनों को चलाने की इजाजत दे सकता है।


अभी 65 परसेंट ट्रेनें ही चल रहीं

अभी कोरोना महामारी को देखते हुए रेलवे 65 परसेंट पैसेंजर ट्रेनों को ही चला रहा है. इसमें मेल और एक्सप्रेस दोनों तरह की ट्रेनें शामिल हैं. रेलवे के इस कदम से लगभग सभी सब-अर्बन या मेट्रो ट्रेनें भी पटरी पर लौट आईं हैं. मुंबई में शुक्रवार यानी 29 जनवरी से 95 परसेंट लोकल ट्रेनों की सेवाएं बहाल हो गई हैं. हालांकि ट्रेनों की संख्या तो बढ़ रही है लेकिन आम लोगों को इसमें सफर के लिए थोड़ा और इंतज़ार करना पड़ सकता है. 

फिलहाल मुंबई में वेस्टर्न रेलवे रूट पर 704 लोकल ट्रेनें चल रही है जिनमें 3.95 लाख मुसाफिर सफर कर रहे है. वहीं सेंट्रल रेलवे रूट पर 706 लोकल ट्रेंने चलाई जा रही है जिनमे करीब 4.57 लाख लोग सफर कर रहे है. 


अभी सिर्फ कोविड स्पेशल ट्रेनें चल रही हैं-

कोरोना की वजह से भारतीय रेल ने ट्रेनों का संचालन रोक दिया था, अब धीरे धीरे ट्रेनों को एक फिर पटरी पर लाने की कोशिश की जा रही है. अभी केवल कोव‍िड स्‍पेशल ट्रेनें ही चल रही हैं. अभी माना जा रहा है क‍ि मार्च में होली जैसा बड़ा त्योहार पड़ेगा. ऐसे में यात्र‍ियों की संख्‍या बढ़ेगी और ट्रेनों की डिमांड भी. 

अभी जो ट्रेनें चल रही हैं वो कोव‍िड स्‍पेशल ट्रेनें हैं, जिनका किराया भी ज्यादा है. अगर सबकुछ सही रहा और तैयारियां हो गईं तो एक्‍सप्रेस, मेमू, डेमू और अन्‍य लोकल पैसेंजर ट्रेनों का परि‍चालन जल्‍द ही शुरू क‍िया जा सकता है. लोग त्योहार में अपने घर ट्रेनों में जा सकेंगे और किराया भी कम देना पड़ेगा


शनिवार, 13 फ़रवरी 2021

हरिओम बाबा का सातवा निर्वाण उत्सव आज, ब्राह्मणपुरी स्थित गादी पर चरण पादुका अभिषेक पश्चात होगा भंडारा




खंडवा- पं. वेदप्रकाश खरे जो अपने जीवनकाल में ही किवदंती की तरह विख्यात हो गए थे। उन्हें निर्वाण प्राप्त किए सातवा वर्ष हो गया है। यह जानकारी देते हुए समाजसेवी  एवं जिला शिवसेना प्रमुख गणेश भावसार एवं निर्मल मंगवानी ने बताया कि बाबा की भक्त मंडली ने 14 फरवरी को उनके निवास ब्राह्मणपुरी बड़ा बम स्थित गादी पर निर्वाण दिवस को उत्सव के रूप में मनाने का निर्णय लिया है। रविवार प्रातः काल पूजन अभिषेक चरण पादुका होगा एवं  दोपहर 12 बजे से प्रसाद वितरण विशाल भंडारा होगा। सभी बाबा भक्त प्रेमी जनता से धर्मलाभ लेने अपील समस्त गुरु भक्तों ने की है।

बुधवार, 10 फ़रवरी 2021

पुलिस के हत्थे चढ़ी लुटेरी दुल्हन, शादी के बाद ज्वैलरी-नगदी लेकर हो जाती थी फरार



खण्डवा- पुलिस ने शादी कर गहने और नकदी लेकर फरार होने लुटेरी दुल्हन सहित गिरोह का पर्दाफाश किया है। पुलिस ने मामले में दुल्हन सहित अन्य आरोपियों को गिरफ्तार किया है। शादी होने के लड़की ससुराल पहुंचती और मौका पाकर ज्वैलरी, नकदी लेकर रात में वहां से भाग निकलती थी।
पुलिस अधीक्षक विवेक सिंह ने बताया कि युवतियों द्वारा पैसा लेकर शादी करने व ससुराल से जेवरात उड़ाने के मामले की शिकायतें अक्सर आती हैं। कई बार स्वजन मान-सम्मान के लिए थाने तक नहीं पहुंचते हैं। इस प्रकार की वारदातें सुनियोजित ढंग से की जाती हैं। हमारी टीम ने मामले का खुलासा करते हुए इस ड्रामे में शामिल दुल्हन अन्य आरोपी को गिरफ्तार किया है।
दरअसल, खंडवा जिले के हरसूद थाना क्षेत्र के अंतर्गत ग्राम तोरनिया निवासी केदार पिता राधेश्याम विश्वकर्मा अपनी स्वंय की शादी करना चाहता था , जिसके व्दारा कई जगह शादी की चर्चाए की गई थी किन्तु कही बात नहीं बन रही थीं . इसी चर्चा के क्रम में ग्राम पाटाखाली के जगदीश पिता हरिप्रसाद से भी बातचीत हुई जगदीश ने पूनम पिता चम्पालाल निवासी सोडलपुर जिला हरदा एवं शकील पिता शरीफ निवासी डगावा भटपुरा जिला हरदा से केदार की शादी के लिए लड़की की बात फोन पर की।
पूनम ने लड़की रागनी (परिवर्तित नाम) का पिता बनकर केदार से फोन पर बात की कि  लड़की की मां बीमार है और हम गरीन है , इलाज के लिए 40,000 रूपये की जरूरत है , तभी लडकी की शादी करेंगे तब केदार ने पूनम को कहा कि लड़की पसद आने पर से इलाज के लिए पैसे दे दूंगा। जगदीश दिनांक 23.12.2020 को केदार विश्वकर्मा को सिराली , हरदा साई मंदिर के पास ले गया। जहा पर राजु उर्फ सईद और उसके पिता शरीफ निवासी हरदा ने लड़की रागनी (परिवर्तित नाम) के बडे पिता व भाई बनकर पूनम (पिता) और शकील (चाचा) के माध्यम से जगदीश के साथ आये हुए लड़के केदार को दिखाई गई।
केदार को लडकी रागनी पसंद आने पर केदार में 40,000 रूपये पूनम (पिता) को शकील के सामने देकर लड़की को अपने गांव तोरनिया ले आया , दूसरे दिन दिनांक 24.12.2020 को न्यायालय हरसूद के पास नोटरी शपथ पत्र एक दूसरे के साथ स्वतंत्र रूप से विवाह करने का तैयार किया गया ।दिनांक 25.12.2020 को पूनम ने केदार को लड़की रागनी की मां का स्वास्थ्य खराब होना बताते हुए सोडलपुर बुलवाया जहाँ केदार अपनी पत्लि रागनी को छोडकर वापस आ गया।
कुछ दिन बाद जब पत्लि रागनी को वापस घर लाने के लिए केदार ने पूनम और शकील से सम्पर्क किया तब पूनम और शकील लगातार आनाकानी रहे , तब केदार को समझ आई की मेरे साथ शादी के नाम पर धोखाधडी कर 40,000 रूपये ले लिए गये है । जिसकी रिपोर्ट केदार ने दिनांक 01.02.2021 को कराये जाने पर शकील.पूनम , जगदीश एवं उक्त लड़की पर अपराध धारा 420,120 बी भादवि के तहत पंजीबद्ध कर विवेचना में लिया गया।
विवेचना के दौरान आरोपी जगदीश पिता हरिप्रसाद निवासी पाटाखाली , शकील पिता शरीफ , वकील पिता शकील निवासी डगावा भटपुरा एवं शरीफ पिता अहमद निवासी हरदा , पूनम पिता चम्पालाल माली निवासी सोलडपुर तथा रागनी (परिवर्तित नाम) को गिरफ्तार किया गया । जिनके व्दारा पूछताछ पर पैसे हडपने के नाम से षडयंत्र पूर्वक केदार से 40,000 रूपये हडपना , लड़की रागनी को सोडलपुर बुलाकर शकील और उसके लड़की वकील के साथ शरीफ पिता अहमद निवासी हरदा के यहा भेजना कबूल किया गया एवं केदार पिता राधेश्याम निवासी तोरनिया के बाद पुनः दिनांक 106.01.2021 को कोतवाली क्षेत्रान्तर्गत 60,000 रूपये लेकर लडकी रागनी की शादी करा दी गई।
आरोपीगण पूनम माली निवासी सोडलपुर , शकील , उसका लडका वकील निवासी डगावा भटपुरा , राजु उर्फ सईद एवं उसका पिता शरीफ निवासी हरदा के लडकी रागनी (परिवर्तित नाम) निवासी विसोनी जिला होशंगाबाद के नकली पिता एवं परिजन बनकरषडयंत्र पूर्वक ऐसे युवक जिनकी शादी किन्ही कारणो से न ही होती है। शादी कराने के नाम पर धोखाघडी कर रूपये लेकर चम्पत हो जाते थे , इनके व्दारा रागनी ( परिवर्तित नाम ) की। 01 नम्बर 2020 मे पहली शादी आमला जिला देवास में 60,000 रूपये लेकर करायी गयी जहां दो सप्ताह रहने के बाद दुल्हन बनी रागनी को चम्पत कर दिया गया।
02 दिसम्बर 2020 मे दूसरी शादी ग्राम तोरनिया हरसूद खण्डवा निवासी केदार पिता राधेश्याम विश्वकर्मा के साथ 40,000 रूपये लेकर की गई थी , जहाँ दो दिन रहने के बाद दुल्हन बनी रागनी को चम्पत कर दिया गया ।03 दिसम्बर 2020 मे ही तीसरी शादी जिला चित्तोड राजस्थान निवासी युवक के साथ 80,000 रूपये लेकर महु मे की गई थी , जहाँ करीब एक सप्ताह रहने के बाद दुल्हन बनी रागनी को चम्पत कर दिया गया । 04 इसी प्रकार जनवरी 2021 मे चौथी शादी थाना कोतवाली क्षेत्रान्तर्गत 60,000 रूपये लेकर करायी गई थी।श्रीमान पुलिस अधीक्षक महोदय के निर्देशन पर अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक देहात व अनुविभागीय अधिकारी पुलिस हरसूद के नेतृत्व में हरसूद थाना प्रभारी अमित कोरी के व्दारा पुलिस हरसूद टीम उनि रूपसिंह सोलंकी , सउनि प्रकाश बडोले , आर 540 ब्रम्हानन्द आर 616 दिलीप आर 672 जितेन्द्र रावत प्रआर . 120 पाकिजा की उपरोक्त लूटेरी दुल्हन के गिरोह का पर्दाफास कर आरोपियों को पकड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका रही।

पीआर कन्सलटेंसी को विज्ञापन से न जोडें यह दुष्प्रचार है : खाड़े



  • मध्यप्रदेश

भोपाल। पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर इस बात की चिन्ता चल रही है कि जनसंपर्क विभाग में एक ऐसी एजेंसी का प्रवेश हो रहा है जो विभाग के सभी काम करेगी। इसमें विज्ञापन भी शामिल हैं। यदि प्रोफेशनल एजेंसी आ जायेगी तो समाचार पत्रों को अधिक दिक्कत आयेगी और अनेकों समाचार पत्रों के बंद होने का खतरा हो जायेगा, जिससे रोजगार छीनेगा। लेकिन आज इस बारे में जब आयुक्त जनसंपर्क सुदाम खाड़े से बात हुई तो उन्होंने इसे गलत बताया और कहा कि यह दुष्प्रचार है। हम एक कन्सलटेंट नियुक्त कर रहे हैं जिसका विज्ञापन वितरण से कोई लेना-देना नहीं है। यह एजेंसी विभाग को प्रचार का बेस तैयार करने में मदद करेगी। अभी यह प्रक्रियारत है।
यहां यह बताना जरूरी है कि केन्द्र व राज्य सरकार की विज्ञापन नीतियां छोटे समाचार पत्रों को अधिक महत्व नहीं देती। जिससे हजारों पत्रकारों के सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हो चुका है। ऐसे में यदि कोई पीआर एजेंसी आये और वह विज्ञापन का काम भी संभाल ले तब बचे-खुचे समाचार पत्रों के सामने भी संकट पैदा हो जायेगा? इसी भाव से इस संकट पर पत्रकारों और पत्रकार संगठनों में गुस्सा है। वे सोशल मीडिया में अपनी बात कह रहे हैं।
इस बारे में आज जनसंपर्क विभाग के आयुक्त सुदाम खाड़े से मुलाकात की गई और उन्होंने इस प्रकार की किसी भी बात को सीरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि विभाग हालांकि इस प्रकार का स्पष्टिकरण  खुद नहीं दे सकता है लेकिन आप मेरे हवाले से इसका उल्लेख कर सकते हैं। नेशनल यूनियन ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय महासचिव सुरेश शर्मा और प्रदेश में संबद्ध इकाई जर्नलिस्ट एसोसिएशन के साथियों ने इस विषय को आयुक्त महोदय के सामने उठाया था। आयुक्त सुदाम खाड़े ने कहा कि यह एक कन्सलटेंसी ऐजेंसी है जिसका काम केवल विभाग को सलाह देना है। वह हमारे काम को संचालित नहीं करेगी। उन्होंने उदाहरण दिया कि पीडब्लूडी में सड़क निर्माण करने वाले अलग होते हैं लेकिन बेसिक की जानकारी देने के लिए एक कन्सलटेंसी ऐजेंसी नियुक्त होती है। वह एजेंसी कार्य की गुणवत्ता के लिए जिम्मेदार होती है। यदि काम गलत निकला तो उस पर कार्यवाही होती है। ठीक ऐसे ही जनसंपर्क विभाग के लिए भी एक एजेंसी को कार्य दिया जा रहा है। इसके लिए अभी प्रक्रिया जारी है। टेंडर खुलने पर शासन को अधिकार होगा कि वह उस कार्य को किस प्रकार से करवाये। इसलिए यह माना जाना चाहिए कि विभाग के रोजमर्रा के काम में कन्सलटेंसी का कोई लेना-देना नहीं होगा।
सुदाम खाड़े ने बताया कि विज्ञापन देने का कार्य पहले भी संचालनालय का था और आगे भी उसी का ही रहेगा। इसके बारे में दुष्प्रचार का कोई मतलब नहीं है। जब उनसे कहा गया कि यह एजेंसी सरकार का चेहरा चमकाने का काम करेगी तब उन्होंने कहा कि नहीं ऐसा नहीं है। यह एजेंसी विभाग को बेहतर कार्य के लिए सलाह देगी और उसका वह मेहनताना लेगी।
आयुक्त जनसंपर्क सुदाम खाड़े ने कहा कि हम प्रदेश के विकास के लिए किये जा रहे कार्यों के लिए जन मानस को जानकारी देते हैं। सरकार जनोन्मुखी कार्य करती है उसका प्रचार किया जाता है। यह कार्य अब भी संचालनालय ही करेगा। विज्ञापन भी संचालनालय की ओर से ही जारी होंगे। इसलिए किसी भी प्रकार का भ्रम पैदा करने का कोई कारण नहीं बनता है। उन्होंने जर्नलिस्ट एसोसिएशन के पदाधिकारियों को कहा कि इस प्रकार का भ्रम यदि पत्रकारों में बनता है तब आप उसे दूर करने में विभाग का सहयोग करें। उन्होंने कहा कि पत्रकारों के हित के लिए सरकार हमेशा संवेदनशील रहती है।

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2021

पत्रकारिता के बदले परिवेश पर स्टेट्स रिपोर्ट तैयार करे एनयूजे-आई: रामबहादुर राय। पत्रकारों में पनपा असुरक्षा बोध कम करना हमारी जिम्मेदारी : अच्युतानंद मिश्र



नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्टस (इंडिया) के स्वर्ण जयंती आयोजनों का शुभारंभ बेबिनार के माध्यम से किया गया। इस ऑनलाइन में 21 राज्यों के पत्रकार शामिल हुए। आयोजन में देश भर के पत्रकारों के मार्गदर्शन के लिए जाने माने वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र, राम बहादुर राय, के. एन. गुप्ता शामिल थे। 

आयोजन के शुरू में स्वर्ण जयंती आयोजन समिति के संयोजक अच्युतानंद मिश्र ने एनयूजे (आई) की संस्थापकों तथा बाद में इसका नेतृत्व संभालने वाले उन 15 उन वरिष्ठ पत्रकारों को याद किया जिनके प्रयासों का प्रतिफल आज नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट के रूप में है। देश भर से जुड़े पत्रकारों ने मौन रहकर उन सभी को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की।

एनयूजे (आई) स्वर्ण जयंती समारोह का शुभारंभ करते हुए वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय ने कहा कि इन दिनों जो पत्रकारिता हो रही है वह पूरी तरह से बदल चुकी है। पत्रकारिता ने अपने मूल चरित्र को खो दिया है। आज सार्थक पत्रकारिता कैसे हो यह सबसे बड़ा प्रश्न है। खबर बेच कर मुनाफा कमाने की प्रवृति हो जाये तो पत्रकारों पर कई तरह के संकट हो जाते हैं। एनयूजे (आई) को मीडिया पर एक स्टेटस रिपोर्ट बना कर स्वर्ण जयंती समारोह के समापन में जारी करनी चाहिए। पत्रकारिता से संबंधित जितने भी कानून बने वह आज अप्रासंगिक हो गए हैं। उन्होंने वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर एक नयी जानकारी देते हुए कहा कि 1951 में ही संविधान में पहला संशोधन पंडित नेहरू की सरकार ने तब कर दिया था जबकि राज्यसभा अस्तित्व में ही नहीं थी, यह संशोधन संविधान के अनुच्छेद 19 में किया गया था जिसके बाद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मौलिक अधिकार मैं कटौती कर दी गई। अबतक देश का मीडिया इस पर चुप है एनयूजे (आई) को यह संविधान संशोधन रद्द करने की मांग करनी चाहिये।



रजत जयंती आयोजन समिति के संयोजक अच्युतानंद मिश्र ने कहा कि हम सभी एनयूजे (आई) के वैसे सभी पुराने नेताओं को याद करते हुए श्रद्धाजंलि अर्पित करें जिन्होंने संगठन गठन किया और उसे बहुत अच्छा स्वरुप दिया। उन्होंने कहा कि आज पूरी मीडिया बदल गई है, श्रमिक संगठन बदल गया, समाचार पत्र स्वयं पेड न्यूज़ कर रहे हैं, ऐसे में पत्रकार कहाँ जाएं। बदली हुई परिस्थितियों में संगठन के ढांचे पर फिर से सोचना पड़ेगा। आज पत्रकारों में असुरक्षा बोध को किस तरह से कम किया जाए इस पर विचार मंथन होना चाहिए।

एनयूजेआई के पूर्व महासचिव के. एन. गुप्ता ने वर्तमान पदाधिकारियों को पूर्ण सहयोग व समर्थन का विश्वास दिलाया। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो केजी सुरेश ने कहा कि आज देश भर के सभी ट्रेड यूनियन समाप्ति की ओर हैं, इसके बावजूद एनयूजे (आई) सक्रिय है, इसकी अपनी विशेष पहचान भी है। उन्होंने पत्रकार प्रशिक्षण की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि राज्य व जिला स्तर पर कार्यरत पत्रकारों के लिए प्रशिक्षण कार्यशालाओं की जरूरत है। पूर्व अध्यक्ष उपला लक्ष्मण ने कहा कि एक सुविचारित रूपरेखा बनाकर स्वर्ण जयंती के कार्यक्रम सभी राज्यों में आयोजित किए जाएंगे। सीनियर लीडर्स को आगे बढ़कर मीडियाकर्मियों का एक सशक्त मोर्चा बनाने की दिशा में सोचना चाहिए। पूर्व अध्यक्ष अशोक मलिक ने कहा कि 23 जनवरी को एनयूजेआई का 50वां वर्ष शुरू हुआ है, संगठन का गठन पत्रकारिता को राजनीति से दूर रखने के उद्देश्य से किया गया था। आज भी पत्रकारिता को राजनीति से अलग रखने की जरूरत है। हमें सतर्क होकर कार्य करते हुए स्वस्थ पत्रकारिता करने वाले पत्रकारों को संगठन जोड़ते रहना होगा। 

स्वागत भाषण में एनयूजे (आई) अध्यक्ष मनोज मिश्रा ने कहा कि कुछ ही दिनों बाद हम सभी आपस मे मिलकर इस स्वर्ण जयंती कार्यक्रम को आगे बढ़ाएंगे। उन्होंने कहा कि 1972 में गठित यह संगठन आज कश्मीर से कन्याकुमारी तक बढ़ा हुआ है। 


कार्यक्रम का संचालन करते हुए एनयूजे (आई) महासचिव सुरेश शर्मा ने कहा कि एनयूजे-आई के स्वर्ण जयंती वर्ष के शुभारंभ में हम सभी गौरवान्वित हैं। सभी महान पत्रकारों को याद करने का वक्त है जिहोने राष्ट्रवादी पत्रकारिता आंदोलन की शुरुआत की थी। मनोज मिश्रा के नेतृत्व में एनयूजे (आई) चल रहे संगठन की पहचान मजबूत है और दिशा भी सही है। उन्होंने बताया कि इस आयोजन में 21 राज्यों का प्रतिनिधित्व है। वर्ष 2021 में हर महीने अलग-अलग राज्यों में कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। सभी महत्वपूर्ण सुझावों को प्रमुखता के साथ लेकर कार्य करेंगे। 

धन्यवाद ज्ञापन करते हुए एनयूजे (आई) के कोषाध्यक्ष उमेश चतुर्वेदी ने सभी नेताओं के संदेश के मुख्य बिंदुओं को रेखांकित किया। आयोजन में एनयूजे (आई) के उपाध्यक्ष सर्वश्री जीतेन्द्र अवस्थी, त्रियुगी नारायण तिवारी, नागेश्वर राव, सचिव श्रीमती आभा निगम, संजय पांडेय, सोमनाथ शर्मा, उदय जोशी तथा बीवीएस भास्कर, वरिष्ठ नेता विजय क्रान्ति, रामभुवन सिंह कुशवाह, ललित शर्मा, मनोहर सिंह, रवींद्र बाजपेयी, बलदेव प्रसाद शर्मा, जीसी श्रीवास्तव, अमलेश राजू, नवीन मल्होत्रा, बिश्वदेव भट्टाचार्य, मनु भारत, अमरनाथ वशिष्ठ, बीरबल शर्मा, अशोक शर्मा, हीरालाल लोंगरे, रामनायण उपाध्याय सहित राष्ट्रीय व राज्य इकाइयों के पदाधिकारी व नेताओं सहित 200 से अधिक पत्रकार शामिल हुए।

सोमवार, 8 फ़रवरी 2021

स्कूल बस बंद हुई तो ये बच्चा अपने घोड़े पर बैठ जाने लगा स्कूल




कोरोना संक्रमण के कारण स्कूलों के हुए लॉकडाउन के चलते सर्वाधिक प्रयोग शिक्षा के क्षेत्र में ही हुए हैं. स्कूल में क्लास में नियमित पढ़ाई का विकल्प ऑनलाइन शिक्षा निकला तो स्कूल बस बन्द होने का अनूठा विकल्प मध्य प्रदेश के खण्डवा ज‍िले के गांव मेंं एक छात्र ने निकाल लिया. वह अब अपने घोड़े पर सवार होकर स्कूल जाता है. वह किसी राज परिवार का राजकुमार नहीं, एक किसान का नन्हा बेटा है जिसे पढ़ाई का जुनून इस कदर है कि स्कूल बस बंद हुई तो अपने घोड़े को ही साधन बना लिया. 
प्रदेश के ग्रामीण अंचलों में स्कूल जाने के लिए कहीं नदी पार कर जद्दोज़हद करते स्कूली बच्चे आपने देखे होंगे तो कहीं रस्सी के पुल पर जोख़िम उठाकर बच्चे भी लेकिन खण्डवा जिले के ग्राम गुराड़ीमाल के 12 वर्षीय शिवराज का मामला थोड़ा अलग है. वह पीठ पर स्कूल बैग बांधे जब अपने दोस्त राजा (घोड़ा ) की पीठ पर बैठकर घर से निकलता है तो सबकी निगाहें उस पर टिक जाती हैं.
दरअसल, यह उसका कोई शौक नहीं बल्कि मज़बूरी है. लॉकडाउन में स्कूल बंद होने के बाद जब बमुश्किल खुले तो बस चालू नहीं हुई. घर से स्कूल पांच किलोमीटर दूर था और रास्ता पथरीला. एकाध बार साइकिल से सवारी की तो पथरीले रास्ते पर गिरकर इतने ज़ख्म खाये कि दोबारा साइकिल की सवारी की हिम्मत नहीं हुई. मुसीबत में उसे अपना दोस्त घोड़ा ही नज़र आया जो उसे सुरक्षित पहुंचाने की गारंटी भी थी.

बच्चे ने बताया क‍ि मैं पहले साइकिल से आता था लेकिन चोट लगने के कारण अब साइकिल से नहीं आता हूं और अब मेरे प्रिय मित्र घोड़े के साथ आता हूं, उसका नाम राजा है. वह भी मेरे साथ स्कूल आता जाता है. मेरे घर से स्कूल पांच किलोमीटर दूर है और रास्ता कच्चा है जिसके कारण साइकिल से गिरने से मुझे चोट लग गयी थी. घोड़े से मैं इसलिए भी आता हूं कि पेट्रोल-डीज़ल के दाम ज्यादा हो गए. 
दरअसल, स्कूल वाहन बंद होने से सबसे ज्यादा परेशानी तो छोटे बच्चों के पालकों की हो गयी जिन्हें उन्हें रोज स्कूल छोड़ने जाना और लाना परेशानी का सबब बन गया. शिवराज के पिता देवराम की भी यही परेशानी थी कि वे अपने बच्चे को नियमित पढ़ाना तो चाहते थे लेकिन उसे रोज स्कूल लाना ले जाना उनकी खेती की व्यस्तता में संभव नहीं हो पा रहा था. तब शिवराज ने साइकिल से गिरने के बाद जब अपने घोड़े से रोजाना जाने का रास्ता सुझाया तो देवराम को भी यह ठीक लगा और सुरक्षित भी.
आज तक के मुताबिक सिर्फ घोड़े की सवारी ही शिवराज को कुछ खास नहीं बनाती, वह पढ़ने में बहुत तेज़ है. स्कूल में अपनी क्लास एक दिन भी नहीं छोड़ना पसंद करता है. घोड़े से शिवराज की दोस्ती इतनी गहरी है कि दोनों एक-दूसरे को थोड़ी देर के लिए भी छोड़ना पसंद नहीं करते. जब यह घोड़ा सिर्फ तीन माह का था तभी शिवराज अपने पिता से ज़िद कर इसे ले आया. उसका पूरा पालन पोषण भी उसने किया. अब शिवराज और राजा की दोस्ती भी मशहूर हो रही है.  

रविवार, 7 फ़रवरी 2021

उत्तराखंड के चमोली जिले में ग्लेशियर टूटने से भारी तबाही, कई के बहने की आशंका, पहाड़ी इलाको में अलर्ट, मुख्यमंत्री ने किया ट्वीट



ऋषिकेश - उत्तराखंड के जोशीमठ में बड़ा हादसा हुआ है. जोशीमठ में ग्लेशियर फटने से अलकनंदा नदी और धौलीगंगा नदी में बाढ़ आ गई है. ऋषिगंगा पावर प्रोजेक्ट को नुकसान पहुंचने की खबर
उत्तराखंड के जोशीमठ में बड़ा हादसा हुआ है. चमोली जिले के तपोवन इलाके में रविवार को ग्लेशियर फटने से ऋषिगंगा पावर प्रोजेक्ट को भारी नुकसान पहुंचने की खबर है. इसमें कई लोगों के फंसे होने की आशंका जताई जा रही है. ग्लेशियर के टूटने से अलकनंदा नदी और धौलीगंगा नदी में हिमस्खलन और बाढ़ के चलते आसपास बसे लोगों को हटाया जा रहा है. कई घरों के बहने की आशंका भी जताई जा रही है. साथ ही जोशीमठ के करीब बांध टूटने की भी खबर है. आईटीबीपी के जवान बचाव कार्य के लिए पहुंच गए हैं. एनडीआरएफ की टीमें गाजियाबाद से चमोली के लिए भेजी जा रही हैं. 

चमोली जिले के तपोवन इलाके में रैणी गांव में बिजली परियोजना पर हिमस्खलन के बाद धौलीगंगा नंदी में जलस्तर अचानक बढ़ गया है. निजले इलाके में रहने वाले लोगों को ऊपरी इलाकों में भेजा जा रहा है. ग्लेशियर फटने से हुई तबाही को देखते हुए श्रीनगर, ऋषिकेश और हरिद्वार समेत अन्य जगहों पर अलर्ट जारी किया गया है.


राज्य के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कहा, "चमोली के रिणी गांव में ऋषिगंगा प्रोजेक्ट को भारी बारिश व अचानक पानी आने से क्षति की संभावना है. नदी में अचानक पाने आने से अलकनंदा के निचले क्षेत्रों में भी बाढ़ की संभावना है. तटीय क्षेत्रों में लोगों को अलर्ट किया गया है. नदी किनारे बसे लोगों को क्षेत्र से हटाया जा रहा है."

उन्होंने कहा, "स्वयं घटनास्थल के लिए रवाना हो रहा हूं. मेरी सभी से विनती है कि कृपया कोई भी पुराने वीडियो शेयर कर पैनिक ना फैलाएँ. स्थिति से निपटने के सभी ज़रूरी कदम उठा लिए गए हैं .आप सभी धैर्य बनाए रखें."
नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क से निकलने वाली ऋषिगंगा के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में टूटे हिमखंड से आई बाढ़ के कारण धौलगंगा घाटी और अलकनन्दा घाटी में नदी ने विकराल रूप धारण कर लिया है जिससे श्रृषिगंगा और धौली गंगा के संगम पर स्थित रैणी गांव के समीप स्थित एक निजी कम्पनी की श्रृषिगंगा बिजली परियोजना को भारी नुकसान पहुंचा है. इसके अलावा, धौली गंगा के किनारे बाढ़ के वेग के कारण जबरदस्त भूकटाव हो रहा है.

शनिवार, 6 फ़रवरी 2021

आधे अधूरे प्रधानमंत्री आवास से लोगों की जिंदगी हुई बेहाल




खंडवा हर व्यक्ति का सपना होता है अपना घर। लोगों का यह सपना सच भी हुआ प्रधानमंत्री आवास से। किन्तु आज दूसरी किस्त के इन्तजार में कुछ लोगों को आधें अधुरे छत विहीन मकानों में रहने पर मजबूर होना पड रहा हैं। प्रधानमंत्री आवास योजना की स्थिति से अवगत करवाते हुए जिला शिवसेना प्रमुख गणेश भावसार ने बताया कि खंडवा में प्रधानमंत्री आवास मिलना एक सुखद एहसास था लोगों के लिए। मगर अब लोगों के लिए प्रधानमंत्री आवास जी का जंजाल बन गया है कारण जिन लोगों ने सपना देखा था कि हमारा अपना सुंदर घर होगा, आवास होगा परिवार के साथ नए आवास में खुशियों के पल बिताएंगे मगर लोगों के सपने उस वक्त मुसीबत में बदल गए जब करीबन डेढ़ वर्षो से प्रधानमंत्री आवास की दूसरी किस्त लोगों के पास नहीं पहुंची ऐसी स्थिति में जिन लोगों ने प्रधानमंत्री आवास का काम इस उम्मीद पर करवा लिया कि उनका आवास दो चार महीने में बनकर तैयार हो जाएगा और उसी आस में लोगों ने अपने बने बनाए कच्चे मकानों को तोड़ दिया और किराए के मकानों में रहने लगें अब समस्या यह उत्पन्न हो गई कि आधे अधूरे आवास में लोग किराए के मकान में रहने के लिए मजबूर है। कारण साफ नजर आ रहा है आवास की दूसरी किस्त लोगों के खातों में ना डाले जाना। लोग इतने परेशान हैं कि जो कच्चे मकान उन्होंने इस उम्मीद पर तोड़े थे कि कुछ समय बाद अपना खुद का पक्का मकान होगा और वह किराए के मकान में रहने लगे मगर आर्थिक स्थिति इतनी खराब है कि लोग किराया नहीं दे पा रहे हैं और ना प्रशासन द्वारा दूसरी किस्त लोगों के खातों में डाली जा रही है। जब लोग शासन प्रशासन के जुम्मेंदारों से इस बारे में बात करते हैं तो सिर्फ आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिल रहा हैं।

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2021

उच्च इलाज के लिए खण्डवा सांसद श्री नंदकुमार सिंह चौहान को भोपाल से दिल्ली किया शिफ्ट



खंडवा- खण्डवा सांसद नंदकुमार सिंह चौहान डॉक्टरों की सलाह पर उच्च इलाज के लिए भोपाल से दिल्ली के लिए रवाना हुए जहां मेदांता हॉस्पिटल दिल्ली में सांसद श्री चौहान का इलाज होगा। सुनील जैन ने बताया कि विगत 20 दिनों से सांसद नंदकुमारसिंह चौहान कोरोना पॉजिटिव होने के कारण भोपाल के चिरायु हास्पिटल में उपचारार्थ भर्ती थे। बुधवार को सांसद श्री चौहान की रिपोर्ट तो निगेटिव आई लेकिन स्वास्थ में सुधार न होने के कारण डाक्टरों व परिजनों की सलाह पर उन्हें उच्च उपचार के लिए दिल्ली रवाना किया गया। तीन दिन पूर्व प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के अनुरोध पर दिल्ली एम्स के तीन डाक्टरों ने भी सांसद श्री चौहान का चेकअप किया था। शूगर और बीपी होने के कारण स्वास्थ में जल्द सुधार न होने का उन्होंने कारण बताया। शुक्रवार को मेदांता हास्पिटल दिल्ली गुडग़ांव के डाक्टर भोपाल पहुंचे और चेकअप के पश्चात दिल्ली ले जाने का निर्णय लिया गया।


प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान भोपाल में डाक्टरों से चर्चा करने के पश्चात सांसद श्री चौहान को दिल्ली भेजने की व्यवस्था की गई। भोपाल हवाई पट्टी पर सांसद श्री चौहान को एयर एम्बुलेंस से दिल्ली ले जाते समय हवाई पट्टी पर प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ ही डॉक्टरों की टीम एवं ज्ञानेश्वर पाटिल, अनिल भोसले, राजू जोशी, सुभाष कोठारी, चंद्रेश पचौरी, विधायक नारायण पटेल, विजय गुप्ता सहित अन्य पदाधिकारी के साथ परिजन भी उपस्थित थे। पुत्र हर्षवर्धन सिंह भी श्री चौहान के जाने से पूर्व फ्लाइट से दिल्ली पहुंचे गए थे।