गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

"नर्मदा प्रकाट्य उत्सव" पर शिप्रा ने लिया १ करोड़ वृक्ष का संकल्प



खण्डवा- नर्मदा जी का प्राकट्य उत्सव शिप्रा अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण दिन मानती है।इस दिन को विशेष तौर पर मनाने के लिए शिप्रा गंगा के तट उत्तर प्रदेश से नर्मदा के तट ओमकारेश्वर पहुँची।माँ नर्मदा के जन्मोत्सव पर उन्होंने एक करोड़ वृक्ष लगाने का वट वृक्ष संकल्प लिया। शिप्रा का जन्म उत्तर प्रदेश के बदायूँ जिले के दातागंज में ब्राह्मण कुल के पाठक परिवार मे हुआ। पिता का नाम डॉ शैलेश पाठक जी समाज सेवक धार्मिक, परोपकारी,संगृहीत -सन्त एवं कर्म योगी,जन नेता है जो अपनी माँ की राजनीतिक विरासत को अपने कर्मों से सिंचित कर रहे है।
एक बड़ी राजनीतिक विरासत का हिस्सा रही शिप्रा जहां उनकी दादी दातागंज क्षेत्र से कई बार विधायक रही, वहीं शिप्रा का एकलौता भैया अंकित पाठक खाद के बिज़नेस से लेकर कई छोटे बड़े स्कूल को सम्भालता है। 
धर्म से ओत प्रोत शिप्रा की माँ बालिकाओं को शिक्षा के प्रति जागरुक करते हुए एक स्कूल की प्रबंधक है
शिप्रा ने अंग्रेजी साहित्य से एम ए की उपाधि प्राप्त कर व्यवसाय मे प्रवृत्त हुई ।इवेंट का काम बड़े पैमाने पर देश विदेश में फैलाया।एक सुविधापूर्ण जीवन को अपनी दम सम्भालते हुए पद,धन और प्रतिष्ठा प्राप्त की।किन्तु इस विधा से वह सन्तुष्ट नही हुई और उसने अपना मार्ग बदल लिया और यही मार्ग उसकी नियति बन गई है। बिज़नेस के साथ साथ शिप्रा अपनी माँ से धर्म की शिक्षा लेती रही।भारत के लगभग सभी सिद्ध स्थानो की यात्रा की। शिप्रा ने चार धाम,सप्तपुरी,११ ज्योतिर्लिंग दर्शन किए।
गोवर्धन परिक्रमा,बिहारी जी परिक्रमा,मनक़ामेश्वर परिक्रमा,कैलाश मानसरोवर दर्शन किए।
आध्यात्म को जीवन का धरातल बनाने वाली शिप्रा के जीवन में एक बड़ा सार्थक बदलाव तब आया जब उन्होंने माँ नर्मदा की 3500 किलो मीटर की पैदल परिक्रमा की।ये परिक्रमा शिप्रा ने अकेले भिक्षा वृत्ति में की। परिक्रमा पूर्ण होने के बाद शिप्रा का माँ के प्रति लगाव और समर्पण इतना बड़ गया कि अपना बिज़नेस छोड़ कर शिप्रा पूरी तरह माँ नर्मदा को समर्पित हो गयी। हर घाट को स्वच्छ रखने हेतु उन्होंने "ग्लोजल संस्था" बनायी जिसके अंतर्गत ये कार्य आरंभ किया कि नर्मदा से लेकर गंगातक,गोदावरी से लेकर ब्रह्मपुत्र तक सभी नदियों के जल को सहेजा जाए।


इसी मुहिम में शिप्रा ने ग्लोजल फ़ाउंडेशन के तले एक "जल शपथ" कार्यक्रम आयोजित किया जिस में हर क्षेत्र के लोगों ने जल बचाने की शपथ ली भी और दिलायी भी। इस जल शपथ में माननीय मुख्यमंत्री से लेकर ज़िलाधिकारी तक,सिद्ध संतो से लेकर भक्तों तक सभी ने जल के प्रति अपना समर्पण दिखाया।
माँ नर्मदा के प्राकट्य उत्सव को सार्थक बनाने हेतु शिप्रा ने ओमकारेश्वर के घाट पर १ करोड़ वृक्ष लगाने का संकल्प लिया।इस संकल्प में उन्होंने अपने राष्ट्रीय वृक्ष को प्राथमिकता देते हुए एक बड़ी संख्या में वट वृक्ष एवं बाक़ी देव वृक्ष लगाने का संकल्प लिया।इन देव वृक्षों में शिव को प्रिय रुद्राक्ष,महाराष्ट्र के आध्यात्म के प्रतीक अवधूम्बर,वैज्ञानिक दृष्टि से सर्वोत्तम पीपल एवं सभी तरह के यज्ञ,हवन में काम आने वाले आम,विष्णु को प्रिय आँवला,पाकड,नीम जैसे औषधीयुक्त वृक्षों का चयन किया।

शिप्रा का मानना है कि जल और वृक्ष एक दूसरे के पूरक है

पानी जीवन का मुख्य घटक है। पेड़-पौधों से वाष्पीकृत जल ही बादल बन गगन में एकत्रित होता है व अमृत बन पुनः धरती की क्षुधा को शांत करता है।
जल मुहिम शिप्रा ने कई सालो से चला रखी है।इसके कारण ही उन्हें "वॉटर वुमन" की संज्ञा मिली हुई है।
शिप्रा ने आयुर्वेद को बढ़ावा देते हुए लेमन ग्रास,खस,श्यामा तुलसी एवं एलोवेरा की पौध का कार्य आरंभ किया। इस मुहिम में वॉटर वुमन ने सभी का सहयोग माँगा है।अपने संकल्प में नर्मदा से लेकर गंगा तक "देव वृक्ष" लगाने की शपथ ली है। 

वॉटर वुमन का ये संकल्प अपने तक ही नही रहा
उन्होंने नर्मदा के तट से अपने पिताजी को भी गंगा के तट पर वृक्ष लगाने का संकल्प दिलवाया।उन्होंने अपने पिता से ये निवेदन किया कि वो अपने राजनीतिक क्षेत्र में प्रतिदिन एक वृक्ष "रेवा" के नाम से लगायेंगे ताकि हर घर को "रेवा की छाँव" मिले।हर घर शुद्ध हवा से भरा रहे और सभी निरोग रहे।अपने वट वृक्ष संकल्प में प्रथम तल पर शिप्रा आश्रमों में वृक्ष लगाएगी।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें