मां तुलजा भवानी सुबह के समय बाल्यावस्था, दोपहर में युवावस्था, वहीं शाम के समय वृद्धावस्था में दिखाई देती,
माताजी की प्रतिमा स्वयंभू प्रकट है। माताजी का स्वरूप महिषासुर का वध करते हुए अष्टभुजी है,
भगवान श्रीराम त्रेता युग में वनवास के दौरान यहां आए थे
खंडवा/मनीष गुप्ता- जिले का प्रसिद्ध तुलजा भवानी का मंदिर खंडवा की धार्मिक एवं पुरातत्व धरोहर में से एक हैं. इस मंदिर में मां भवानी की स्वयंभू मूर्ति विराजित हैं. रामायण काल की बताई जाती है , जो दिन के तीन पहर में अलग-अलग रूप धारण करती हैं. सुबह के समय बाल्यावस्था, दोपहर में युवावस्था, वहीं शाम के समय वृद्धावस्था में दिखाई देती हैं.यह मंदिर खंडवा जिले की धार्मिक और पुरातात्विक धरोहरों में सबसे प्राचीन और प्रसिद्ध माना जाता है. गर्भगृह में स्थापित भवानी माता सिद्धीदात्री के रूप में विराजित हैं, जो अष्टभुजी स्वरूप में सिंह पर सवार होकर राक्षसों का वध कर रही हैं.
भवानी माता मंदिर भक्तों की आस्था और विश्वास को अपने में समेटे हुए है. मंदिर के विषय में धार्मिक पौराणिक उल्लेख मिलते हैं, जिसमें इस मंदिर का महत्व बेहद प्रगाढ़ रूप से मिलता है. मंदिर के साथ जुड़ी मान्यताएं और किंवदंतियों श्रद्धालुओं में बहुत प्रचलित हैं. मां तुलजा भवानी के इस स्थान को रामायण काल के पावन समय से जोड़ा जाता है.
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने की थी मां तुलजा भवानी की आराधना
तुलजा भवानी मंदिर को लेकर मान्यता है कि 14 साल के वनवास के दौरान प्रभु श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण के साथ खांडव वन (वर्तमान खंडवा) आए थे. भगवान श्रीराम ने इस मंदिर में 9 दिनों तक मां तुलजा भवानी की आराधना की थी और मां से अस्त्र-शस्त्र का वरदान लेकर दक्षिण की ओर प्रस्थान किया था.
छत्रपति शिवाजी की कुलदेवी थी मां तुलजा भवानी करते थे आराधना
महाभारत काल में भगवान श्रीकृष्ण ने धनुर्धर अर्जुन के साथ यहीं पर अग्निदेव का अजीर्ण रोग का उपचार किया था और देवी की शक्ति से इंद्र को वर्षा करने से रोका था. वहीं मराठा नायक छत्रपति शिवाजी मां तुलजा भवानी को अपनी आराध्य देवी मानते थे. किवंदती है कि शिवाजी को मां भवानी ने शमशीर प्रदान की थी, उसी शमशीर के तेज से उन्होंने मुगलों के दांत खट्टे कर दिए थे.
धूनीवाले दादाजी ने इन्हें तुलजा भवानी नाम दिया
खंडवा में स्थित मां तुलजा भवानी मंदिर अति प्राचीन होने के साथ-साथ दादाजी का भी मंदिर है केशवानंद जी महाराज बड़े दादा जी और हरिहर भोले छोटे दादा जी ,भवानी माता को स्थानीय लोग नकटी माता कहते थे. वहीं धूनीवाले दादाजी ने इन्हें तुलजा भवानी नाम दिया था. तभी से इन्हें इस नाम से जाना जाता है. तुलजा भवानी की यह प्रतिमा जमीन से प्रकट हुई थी. तुलजा भवानी के दरबार में नवरात्रि के 9 दिनों में खंडवा और आसपास के क्षेत्रों से मां के भक्तों दर्शनों के लिए आते हैं. ऐसा माना जाता है कि नवरात्रि के दिनों में यहां भक्तों के द्वारा जो भी मनोकामना मांगी जाती है, वह पूरी होती है।
मंदिर के गर्भ गृह चांदी से बना मंदिर के सामने विशाल दीपशिखा
मां तुलजा भवानी मंदिर भव्यता का एहसास मंदिर के गर्भ गृह में चांदी का उपयोग से होता हैं. दीवारों पर चांदी से नक्काशी की गई है, जो देखने में अनूठी प्रतीत होती है. देवी पर चांदी का छत्र सुशोभित किया गया है. वहीं माता के मुकुट को चांदी व मीनाकारी से सजाया गया है.मंदिर परिसर के भीतर विशाल दीपशिखा का निर्माण है. दीपशिखा नवरात्रि में 9 दिन तक दीपक लगाए जाते हैं,तुलजा भवानी का यह मंदिर संपूर्ण निमाड़ क्षेत्र की आस्था का प्रमुख केंद्र है. यहां पर अनेक उत्सव का आयोजन होता है जिसमें मकर संक्रांति, होली उत्सव ,शिवरात्रि, रामनवमी दुर्गा पूजा काफी उत्साह के साथ मनाए जाते हैं.
नवरात्र शारदीय नवरात्र चैत्र नवरात्रि में मां तुलजा भवानी का होता है विशेष श्रृंगार
.मंदिर के पुजारी गौरव सिंह चौहान बताते हैं कि यह मंदिर त्रेता युग से स्थापित है और यहां माता रानी सभी भक्तों की मन्नतें पूरी करती हैं. यह प्रतिमा स्वयंभू है और इस मंदिर का इतिहास 5,000 वर्ष पुराना है. नवरात्रि के नौ दिनों तक यहां माता जी की आराधना बड़े श्रद्धा भाव से की जाती है. दोनों ही नवरात्र में माताजी का विशेष श्रृंगार किया जाता है माता जी की विशेष ड्रेस कोलकाता सहित राजस्थान के कारीगरों द्वारा बनाई जाती है माताजी का विशेष श्रृंगार आकर्षण का केंद्र होता है।







